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राजन ही उस के मन का राजा था !!

सबसे मिली

गतांक से आगे :-

भाग -४८

नई दुनियां -न्यूज़ एजेंनसी ने महिला जगत को आंदोलित कर दिया था !

जब से खिलौना राम ने पारुल के सामने घुटने टेके थे , तभी से पारुल का नाम परवान चढने लगा था ! पूरा कलकत्ता ही नहीं समूचा जगत जांन गया था -पारुल के प्रभाव को ! और अब हर कोई उस के बारे में सब कुछ जानने को लालायित था .

बंबई की पत्रिका ‘महिला -जगत ‘ ने पारुल का एक बेहद असरदार चित्र अपने मुख-प्रष्ट पर छापा था . पत्रिका ने पूरे खिलौना राम के चरित्र को ले कर व्यवस्था पर करारी चोट की थी .. समाज को गुनहगार बताया था और महिलाओं पर होते अत्याचारों का खूब खुलासा किया था. पहले ही पृष्ट पर पारुल के चित्र के साथ मोटे-मोटे शब्दों में प्रश्न लिखा था, “क्या औरत अबला है?” और इस प्रश्न का उत्तर पारुल के ही शब्दों में .. भीतर एक मोटे शीर्षक ‘शक्ति’ के अंतर्गत लिखा था, “नहीं! वह तो दुर्गा है!!”

समाज की नीद खुलने लगी थी.

पुरुष प्रधान समाज का नंगा चेहरा सामने आया था. जुर्म ढाते खिलौना राम जैसे लोगों के हौसले पस्त हुए थे. पुलिस-प्रशाशन दोनो ही अचानक हरकत में आये लगे थे. नई दुनिया न्यूज़ एजेंसी को नया काम मिलने लगा था. खास कर महिलाएं – जो पीड़ित थीं .. प्रताड़ित थीं और उपेक्षित थीं नई दुनिया के दरवाजे खटखटा रहीं थीं .. अपना हक़ मांग रही थीं .. दुहाई दे रही थीं कि ‘परमात्मा नहीं उनकी पुकार व्यवस्था सुने. समाज सुने .. लोग सुने .. और निर्णय लें कि क्या नारी पर होते जुल्म जायज हैं?

गप्पा और पवन काम में नाक तक डूबे थे.

नई दुनिया ने नया दफ्तर ले लिया था. स्टाफ भी बढ़ा दिया था. काम करने के अच्छे अवसर पत्रकारों को मिलने लगे थे. चूँकि आमंदनी अच्छी हो गई थी इसलिए पारुल ने सबका मुंह मीठा कराने की घोषणा कर दी थी. वह चाहती थी की उसका स्टाफ और उससे सम्बंधित लोगों का हिस्सा उन्हें मिले. पारुल – नई दुनिया की नई जान जैसी बन कर सामने आ खड़ी हुई थी.

पारुल के काम और नाम से सब प्रसन्न थे!

“जो इसके साथ हुआ वह तो कुछ भी नहीं था.” पारुल अपने ऑफिस में बैठी सोच रही थी. जो सामने आ रहा था .. जो घट रहा था .. जो अनवरत होता ही चला जा रहा था, वो तो बहुत भयंकर था. समाज का गला सडा कचरा .. टूटते संबंधों की दुर्गन्ध .. स्त्री पर होते अमानुषिक प्रहार .. और अबलाओं की सरेआम लुटती लाज – कुछ ऐसे प्रसंग थे जिन्हें कुरेदते ही एक क्रोध का भभका उठता और उसके पुरे मन मस्तिष्क पर छा जाता. एक छटपटाहट का जन्म होता और फिर शक्ति लौटती. लड़ने की शक्ति .. प्रहार करने का दम .. और बुराई को पस्त करने का हौसला !!

“मतलब कि .. मैडम .. मत लिखिए ..” पारुल के सामने खड़ा पुलिसे का एक अधिकारी प्रार्थना कर रहा था. “हम .. सब ठीक-ठाक ..” वह कहने लगा था.

“क्या ठीक करेंगे?” पारुल का कंठ रुंध गया था. “कर ली उसने तो आत्महत्या ..!!” पारुल रोना चाहती थी. “आप लोगों को बिलकुल भी दया नहीं आती ..?” वह प्रश्न पूछ रही थी.

ऑफिस में एक मौन भर आया था. एक ख़ामोशी थी .. जो खड़े-खड़े उपवन को उजड़ते देख रही थी. समाज के हाथों ही .. टूटता-बिखरता समाज .. आदमी को खाता आदमी .. पत्नी को पीटता उसका पति-पुरुष और .. और प्रेमियों की तलाश में भटकती रूहें आत्माएं .. प्रेमिकाएं ..?

कैसा युग आ रहा था ……?

“वायदा करो की तुम सब ठीक-ठाक कर दोगे.” पारुल ने आंसू पोंछ दिए थे.

“जी .. जी साब ……….! मै आपको रिपोर्ट करूँगा. खुद आ कर ..”

“ठीक है!” पारुल ने फाइल बंद कर दी थी.

व्यवस्था तो है, पारुल एक निष्कर्ष पर पहुंची थी. “अगर व्यवस्था चाहे तो जमीं पर स्वर्ग उतार सकती है. संभावनाओं से भी आगे सबकुछ हो सकता है!” वह मान रही थी. लेकिन किन्ही अनजान कारणों की वजह से, जो होना चाहिए था वो हो नहीं रहा था.

पारुल को लगा था की अचानक ही वह एक बहुत पवित्र और नैतिक दायित्व का निर्वाह करने लगी है.

“राम तेरी मैली गंगा .. अगर निर्मल गंगा बन जाये .. मेरे प्रयासों से ही अगर समाज सुधर जाये .. और अपना सही स्वरुप ले ले तो मेरे लिए इससे बड़ा और कोई सौभाग्य नहीं होगा” पारुल ने मूक प्रार्थना की थी.

“और कैसी चल रही है तुम्हारी पूजा-प्रार्थना?” फ़ोन पर सावित्री थी. कुशल मंगल पूछ रही थी. “मुझे तुम्हारी चिंता हो आती है, कभी-कभी.” उनकी शिकायत थी.

“क्यों-क्यों, दीदी ..?” गहक कर पारुल ने पूछा था. “पिछली एकादशी का व्रत मेने लिया था .. और महामंडलेश्वर गई थी ..”

“सच ..?” सावित्री प्रसन्न थी. “सच, पारो .. अब तो तू ही मुझे अपना सहारा .. किनारा .. और सुन्दर स्वप्न लगती है! न जाने क्यों मै अब तेरे लिए मन्नतें मांगने लगी हूँ!”

“यू आर सिम्पली ग्रेट दीदी!” पारुल कह रही थी. “ओह होल्ड वन.” अचानक उसने फ़ोन पर कहा था. “शायद .. हाँ, शायद क्यों .. राजन ही आये हैं !” पारुल ने सूचना दी थी. “कोई आने की .. ”

“फिर फ़ोन करुँगी …..!” कह कर सावित्री ने अपनी बात समाप्त कर दी थी.

गंगा-जमुना मिल कहाँ पाती हैं ! बीच में खडा हिमालय – उनका स्वामी होने का दंभ लिए उन्हें दो अलग अलग दिशाओं में बने रहने के लिए बाध्य करता रहता है. पारुल ने आँखें भर कर राजन को निहारा था. आकर्षक लग रहा था. लग रहा था कोई राजपुरुष हो .. कोई फ़रिश्ता हो .. जो ढेर सारे सपने ले कर लौटा हो .. ! पारुल पैलेस मात्र राजन के आने से गुलज़ार हुआ लगा था. ये कैसा विचित्र आगमन था .. एक आदमी का .. एक पुरुष का .. जो वांछित था .. आदरणीय था .. आमंत्रित था. फिर वह ‘पुरुष सत्तात्मक समाज’ का विरोध क्यों करती है. पुरुष के बिना .. रहेगा क्या – प्रकृति के पास……..?

आगत-स्वागत की रस्म पारुल ने एक अलग उत्साह के साथ की थी. खबर ना देने का उलाहना तो दिया ही था .. साथ में रूठ जाने की धमकी भी दी थी.

“मै .. अपने आप को रोक नहीं पाया योर ग्रेस !” राजन उसके पास बैठा-बैठा बता रहा था. “ये .. ये .. देखो !” उसने ‘महिला जगत’ पत्रिका को पारुल के मुआइने के लिए पसार दिया था. “ये .. तुम्हारा .. माने की हर हाइनेस का .. बोलता .. डोलता .. और ललकारता-फटकारता चित्र !!” वह तनिक मुस्कुराया था. उसने सीधा पारुल की आँखों में देखा था. वह बता रहा था. “नींद हराम कर दी .. मात्र .. इस ..”

“लिखा भी तो होगा कुछ ?” पारुल ने बात घुमाई थी.

“गोली मारो ..!” राजन ने पारुल को बांहों में समेटा था. “हु केयर्स ..” उसने नारा जैसा दिया था. “मै .. मै माने कि मै .. विचित्र लोक की ओर से न्योता देता हूँ कि आने वाले उत्सव की जान-मान और आन होंगी .. हर हाइनेस – काम-कोटि .. माई स्वीट -स्वीट पारुल!!” शहद टपक रहा था राजन की जुबान से. “सच में मै चाहूँगा कि आप स्वयं इस पब्लिसिटी को हाथ में लें .. और ……”

“गप्पा को बता दूंगी.” पारुल ने प्रसन्न होकर कहा था.

“गप्पा ..?” चौंका था राजन.

“अरे हाँ ! मेरी प्रेस सेक्रेटरी है. वैरी वैरी टैलेंटेड गर्ल! भाई ! क्या लिखती है. शब्दों में जान फूंकना तो कोई गप्पा से सीखे ..”

“और आप से क्या सीखें?” राजन का प्रश्न था. उसके स्वर में शरारत थी. वह आज चुहल के मूड में था.

“तुम .. मेरा मतलब .. राजू .. ! बहुत-बहुत पाजी हो…..!” पारुल ने राजन की आग्रही आँखों में झाँका था. एक बड़े वक्त के बाद वह अपने राजन को देख रही थी. “तुम .. तुम मुझे मना ही लेते हो ..” पारुल ने उलाहना जैसा दिया था.

“और .. है ही कौन मेरा ..?” राजन गंभीर था. “अब तो मेरे आगे पीछे केवल एक ही नाम है – पारुल!!” वह भावाकुल था .. सच्चा प्रेमी था .. और एक अच्छा इंसान था !

कच्चे-कच्चे इन पलों में पारुल अपने प्राप्त पद से नीचे खिसल गई थी.

“मै .. मै .. नई दुनिया द्वारा .. ‘विचित्र लोक’ को तीनो लोकों में स्थापित कर दूंगी.” पारुल कह रही थी. “लाये हो कुछ ..? मेरा मतलब .. कुछ .. फोटोग्राफ्स और पब्लिसिटी का मसाला ?”

“हाँ-हाँ! लेकर लौटा हूँ!” राजन ने झट से लिफाफे पारुल के सामने रख दिए थे. “ये है ! ये लो अपना विचित्र लोक .. ये ब्रह्मपुत्र .. मानस .. और ये सोना झील ..”

“ओह..! खजाने जैसे हैं.” सराहा था, पारुल ने. “गप्पा इनके साथ शब्द जोड़ कर .. इन्हें जिन्दा कर देगी .. इन्हें जुबान दे देगी. फिर देखना कि – कि किस तरह लोग खींचे चले आते हैं ..?”

“वही तो मै चाहता हूँ ,योर हाइनेस ! फर्स्ट .. शॉट .. और सक्सेस .. !! एक बार लोगों के मन चढने तक की देर है ! फिर तो – जुआ .. शराब .. शबाब अपने मरीजों को खुद खींच लाते हैं. जैसे कि हर पैसे का मरीज लास वेगस जरुर जाता है .. वही उसकी मक्का-मदीना है. उसी तरह ..”

पारुल महसूस रही थी .. पास खड़े पल थे .. सुनहरी पल. क्षण थे – राजन के साथ जिए सहवास के क्षण. राजन की सेवा…. प्रसंशा सभी सराहनीय थे. राजन ही उसके मन का राजा था .. उसका आकांक्षित .. और इच्छित पुरुष था…!!

क्रमशः

मेजर कृपाल वर्मा साहित्य

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