कहानी
‘‘दुखों की और सुखों की मात्र एक विभाजन रेखा है ! इनका अंत नहीं आता …..!!’’ श्रवण श्रीवास्तव मुझे बता रहे थे . ‘‘अब ये भापे गर्रा रहा है ! किसी ने सामान चोरी कर लिया है . पर बुरी-बुरी गालियां बकने से ?’’ उसने मेरी ओर देखा है .
‘‘ठंडा हो लेगा ! जेल है …!’’ मैं तनिक हॅसा हूॅ . ‘‘पिन्नियाॅ लाया था . बदमाषों ने बाॅट खाई ! अब दाॅत फाड़ रहे हैं …..’’
‘‘कुच्छ…नही …होता एक बार हो जाने के बाद …! अब चाहे जितना रोये …चिल्लाये …गालियां दे ! होतव्य तो ….?’’ श्रवण श्रीवास्तव की आंखों में घोर निराषा घिर आई है . ‘‘अभिशेक- मेरा बेटा …तो मेरा प्राण था . मेरे सपने और मेरा सौभाग्य – मेरा अभिशेक ही तो था ? मेरा अकेला बेटा था , वर्मा सहाव !’’ वह फिर से मेरी ओर मुड़ा था . ‘‘अपने पेट पर लिटा कर…मैं घन्टों उस की पीठ सहलाता रहता था ! षारदा तो नाराज ही हो जाती थी !’’
‘‘गिफटें भी तो खूब लाते होगे …?’’ मैंने भी अपने दिन याद करते हुये पूछ लिया है .
‘‘नहीं वर्मा सहाव ! तब हमारी गरीबी के दिन चल रहे थे . बहुत लाचारियां थीं . पैसा हाथ-हथेली था कब …? खर्चो के मारे कमर टूट जाती थी . लेकिन अभिशेक को बाॅहों में लेते ही मैं दुनियां भर के गम भूल जाता था . मैं भूल ही जाता था , वर्मा सहाव कि …’’
‘‘अकेला ही था- अभिशेक ?’’
‘‘नहीं ! सुजाता उस से छोटी थी . माँ की गोद में घुसी रहती थी . लेकिन हाॅ , सुजाता के आने के बाद से हमारी किस्मत चमकी ! व्वारे–के-न्यारे होते ही चले गये ! मैंने तब खरीदा था ये प्लाट , सन्जय कालोनी में . और फिर बनाया था – अपने सपनों का राज-महल- कैलाष मानसरोवर !’’ श्रवण ने आॅख उठा कर मुझे देखा था . ‘‘पांच मंजिला मकान, विद आॅल द माडर्न फेसिलिटीज….! लिफट भी तो जर्मन कम्पनी ने लगाई थी ? सामने झील थी , बगीचा था , उपर टैरेस गार्डन था एन्ड….एन्ड नेम इट -वो सब वहां था !!’’ चमक आ गई थी – श्रवण की आॅखों में
‘‘किराये पर उठाया होगा ?’’ मैंने स्वाभाविक प्रष्न पूछा था .
‘‘बीच की तीन मंजिल और नीचे का षारदा को दे कर…उपर का अपने लिये रख लिया था . बार से लेकर बाथ रूम तक- सब सुपर्व था ! और तब रात को मै …व्हिस्की का पैग ले कर बालकनी में खड़ा हो सन्जय झील को देखता था तो, ‘कैलाष मानसरोवर’ के दर्षन करता…पर षिव को हमेषा ही भूल जाता !’’
‘‘सुख में षिव याद भी नहीं आते ….?’’ मैं जोरों से हॅस पड़ा था .
‘‘मेरा नेचर ही एैसा है , वर्मा साहव ! मैंने न तो कोई दोस्त बनाया …और न ही किसी रिस्तेदार को ही घास डाली ! यहाॅ तक कि मैंने कभी किसी कुत्ते तक को रोटी नहीं डाली ? मैंने सब अपने लिये ही किया . मैंने कभी किसी की मदद नहीं की !!’’ श्रवण तनिक षर्मा गया था.
‘‘उस से क्या फर्क पड़ता है ….?’’ मैंने यूॅ ही बात साधी थी .
‘‘पड़ता है, वर्मा सहाव !’’ श्रवण श्रीवास्तव जैसे किसी यात्रा से लौटा हो ! ‘‘मुझ से पूछिये कि क्या फर्क पड़ता है ?’’ उस का गला भर आया है . ‘‘साल से उपर हो गया ….कोई मिलने तक नहीं आया !’’ वह रोने लगा है .
‘‘आखिर ऐसा क्या हुआ ….जो …?’’ मैं भी चैंक पड़ा हूॅ . ‘‘आप तो कहते हैं कि ….‘कैलाष मानसरोवर ’ …?’’ मैं कुछ समझ नहीं पाया हॅू .
‘‘बेटा …!’’ तनिक होष संभाल कर कहा है , श्रवण ने . ‘‘अभिशेक …! मेरे प्राणों से भी प्यारा – अभिशेक …!! मैंने अपने इन्ही हाथों से मारा !!! गोली मारदी …मैंने उसे , वर्मा सहाव !’’ वह अब फिर से सुबकने लगा है . ‘‘कोई काम नहीं कर पाया था – अभिशेक . तीन बार पैसा लगाया – पर फेल ! लेकिन उस की पत्नी मल्टीनैषनल में काम करती है .दो बटियां हैं – रौनी-पौनी ! पैसों की तो हमें कोई फिकर थी ही नहीं ?’’
‘‘फिर ….?’’
‘‘फिर क्या…? ‘जिद बाजी’ में बिगड़ा काम . अभिशेक को जिद थी कि मै ‘कैलाष मानसरोवर ’ उस के नाम करादूॅ . और मैं, पता नहीं क्यों – चाहता था कि ‘कैलाष मानसरोवर’ मेरे मरने के बाद ही ….? बस यही जिद हम दोनो के बीच चलती ..! झगड़ा होता तो षारदा मुझे समझाती …और विनीता उसे खींच ले जाती ! षारदा ने तो मुझे मना भी लिया था कि मै सब कुछ अभिशेक के ही नाम लिख दूॅ !!’’
‘‘फिर ….?’’
‘‘करादिया सब मेरे नाम….?’’ अभिशेक ने मुझे घुड़क कर पूछा था . ऐसा ही इतवार का दिन था. . षारदा पोतियों को ले कर पार्क में चली गई थी . विनीता काम से बाहर गई थी . हम दोनों अकेले थे .
‘‘नहीं ….!!’’ मैने भी ठसक में उत्तर दिया था .
‘‘आज फैसला हो ही जाये …..?’’ कह कर वह घर में भीतर भागा था .
मैं डर गया था ! मैं भी दौड़ा था और अपनी रिवाल्वर ले आया था ! अभिशेक जैसे ही मेरे सामने आया था मैंने गोली चला दी थी ! अभिशेक मरा पड़ा था . खून बह रहा था . मैं वहीं पड़ा-पडा रो रहा था !
‘‘मेरा ये कोई नहीं ! इस ने मेरे भाई को मारा है …!!’’ बेटी ने कोर्ट में बयान दिया है .
‘‘मेरा बेटा मारा है – इस ने ! मैं इसे माफ नहीं कर सकती ….!!’’ षारदा ने कह दिया है .
‘‘मेरे पति का हत्यारा मेरा कोई नहीं लगता ?’’ विनीता का बयान है.
श्रवण श्रीवस्तव ने मेरी ओर देखा है . आॅखें नम हैं . होठ काॅप रहे हैं . जुवान लड़खड़ा रही है .
‘‘कैन्टीन से कुछ खरीदना है ! थोड़ी मदद करेंगे, वर्मा सहाव ….?’’
धरती कुरेद रहा है – श्रवण श्रीवास्तव …….
कृपाल . .

