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Laal Gulaab

बाबुल की दुआएं मुझे क्यों नहीं मिलीं …?

कहानी – समापन किश्त .

हाँ,हाँ ! आज शाम को मैंने मधुर के पास चले जाना है !

अपना घर छोड़ कर जाना है . नहीं,नहीं ! यह मेरा घर तो था ही नहीं ! मेरे तो जन्म पर ही यह बेगाना हो गया था . तय था कि मुझे इस घर को छोड़ कर जाना होगा . आज जा रही हूँ . अपनी कार में अपना सब कुछ रख लिया है . है भी क्या मेरे पास ? लत्ते -कपडे ….कुछ किताबें ….चंद फाइलें …और मेरा पर्स ! यहाँ का सब तो इन का है !! 

"जा रही हो …?" किसी और ने नहीं , वक्त ने पूछ लिया है . 

"क्यों …? अट्ठाईस साल के इंतज़ार के बाद …आज निकली हूँ ." मैंने वक्त के मुंह पर कस कर तमाचा मारा है .

बस . आफिस जा रही हूँ . और वहीँ से शाम को मधुर के पास ….अपने 'घर' …..'ससुराल' में चली जाउंगी ! यहाँ तो सब गुप-चुप है ….एक अबोला है ! पिता जी तो न जाने कहाँ गुम हैं ? भाई कल ही रूठ कर भाग गया था . माँ – एक बे-कल रूह-सी इघर-उधर डोल रही हैं . न कुछ कह पा रही हैं ….और न ही मेरी सुन पा रही हैं . वह भी तो स्त्री हैं …मेरी ही तरह हैं – अवश !!

चली हूँ तो दो आँसू मेरी जिद्दी आँखों से टपक पड़े हैं ! आज आफिस में मन नहीं लग रहा है . यूं ही एक परछाईं की तरह इधर-उधर डोल रही  हूँ . शाम को जाना है . सूरज तो डूबेगा ही . शाम तो ढलेगी ही . दिन का अंत आना तो निश्चित है . और अब मेरा जाना भी निश्चित है . लेकिन मधुर ने बुलाया क्यों नहीं ? उस का कोई फोन तक नहीं आया ! लेकिन सब तो तय है . उसे भी तो मेरा इन्तजार होगा ? वह भी तो सोच रहा होगा – शायद हाँ , शायद नां !! कितना बड़ा सस्पेंस है ! व्हाट ए ….रोमांच !! जितनी मैं आंदोलित हूँ ….शायद मधुर भी उतना ही …अपनी शमा को पाने के लिए …बे-ताब होगा !!

आफिस बंद हो गया है . मैं भी अपनी कार में आ कर बैठ गई हूँ . क्या करू ? चलूँ ….? डर लग रहा है ! कार को स्टार्ट करने में हाथ काँप रहा है . यों तो फासला ही कितना है ? चली नहीं कि …पहुँच ही जाउंगी ! और फिर तो मधुर से आमना -सामना हो ही जाएगा !!

"वेलकम ….होम !" मधुर ने कार का दरवाज़ा खोला है . 

लगा है – जैसे जिन्दगी ने मुझे जगह देदी हो …..धरती ने जैसे मुझे अपनी गोद में भर कर उठालिया हो और आसमान मेरे आदर में खड़ा हो !! 

"प्लेज़र …टू  ….बी …विद …यू …!!" मैंने विहस कर मधुर से कहा है .

अंदर की हवा गरम है !! 

मधुर ने मेरे स्वागत में न जाने क्या-क्या कर डाला है …! घर सजा-वजा है . एक कोमल-सी मंहक चारों और डोल रही है . सब करीने से सजा धरा है . मेरे स्वागत में मधुर ने काफी और स्नेक्स का बंदोबस्त किया है . हम दोनों साथ-साथ बैठ कर काफी पी रहे हैं . भला-सा एक एकांत हमारे पास खड़ा है . मधुर ने कई बार मुझे छू लिया है . मैंने भी इन स्पर्शों का स्वागत किया है . अब मैंने उसे आमंत्रित किया है कि ….वो ….

लेकिन एक चुप्पी बनी ही रहती है ! 

"कैसा लगा …आना …?" मधुर ने हिम्मत के साथ सन्नाटे को तोडा है . "मतलब कि …मेरे पास आना …?" उस का प्रश्न है .

में उत्तर नहीं दे पा रही हूँ . मैं न जाने कैसे अपने घर लौट आई हूँ ? मैं प्रश्न कर रही हूँ …कि क्यों …क्यों नहीं आई बरात …? कहाँ है – बेंड बाजा …? क्यों नहीं हो रहे गीत-नांद …? ढोलक पर अभी तक थाप क्यों नहीं पड़ी ….? उन सारे नेग-चारों का क्या हुआ …जो महीनों पहले आरंभ हुआ करते है …? डोली कहाँ है …? और मेरी विदाई ….

सूना माथा ले कर घर से चली आई हूँ …..! हे, भगवान् ! ये कैसा नया चलन है ? पुराना तो सब डूब-डाब गया !!

हमारे बीच बैठी चुप्पी को एक शोर-शराबे ने तोड़-फोड़ डाला है . कहीं पडौस में हीं …किसी की बेटी विदा हो रही है . बिन बुलाए गीत के बोल हमारे बीच आ खड़े हुए हैं , 'बाबुल की दुआएं …लेती जा ….! मेरी आँखें सजल हैं . मैं रोने लगती हूँ . मधुर ने मुझे बांहों में भर लिया है . लेकिन मेरी रुलाई नहीं रुकती . मैं आज फूट-फूट कर रो रही हूँ . मधुर की बांहों में भरे-भरे मैं आज खूब रो लेना चाहती हूँ !!

मेरे बाबुल की दुआएं …..मुझे क्यों नहीं मिलीं …..मैं पूछ लेना चाहती हूँ !!

…………………..

श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !! 

 

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