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खानदान 148

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“ये बात कैसे सबके सामने पहुँची..!! कि मेरे पास लाख रुपये आ गए हैं!”।

रमेश बुरी तरह से चिल्ला कर बोला था।

सब एकदम चुप हो गए थे.. किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया था।

” कोई बात ना.! यो पैसे रमेश ने धर लेन दे!”।

माताजी ने बेटे के लिए. लाड़ दिखाते हुए, कहा था।

” वैसे तो ताऊ-ताऊ.. देखा..! लाख रुपए आने वाले हैँ! तो बाप का एकाउंट नंबर दे डाला.. तब ताऊ याद नहीं आया..!”।

रमा यह जानकर कि, रमेश के बैंक में लाख रुपए आ गए हैं.. चिल्ला कर बोली थी।

हिस्से का चक्कर था.. लोग हिस्सा देने की बजाए अब रमेश पार्टी को लात मारना चाह रहे थे..

” ओ! माँ वाली जमीन बेच कर लड़कियां पाल लीं.. इब बापू की खान ने तैयार बैठा है..!!”।

विनीत रमेश के पैसे उड़ाने को लेकर बोला था.. मतलब केवल हिस्से से ही था। रामलालजी की ज़मीन में बेशक पूरा हिस्सा बनता था.. रमेश का! पर सारा खेल हिस्से के चारों तरफ़ घूम रहा था.. सारे खिलाड़ियों की नज़र अपने-अपने तरीके से दर्शनाजी पर टिकी हुई थी.. संपत्ति और बटवारे की मालकिन और सबसे बड़ी.. लालची और चोर!”

दर्शनाजी ने अपनी पूरी ज़मीन बेच कर पैसे रमेश को न जाने क्यों उड़ाने-खाने के लिए दे दिये थे.. अब रमेश की नज़र पिता के हिस्से पर थी.. बोरा भर-भर नोट खाने की आदत जो हो गई थी। पूरी गलती रमेश की भी न थी.. माँ ने यह कहकर.. ” अरे! तेरे क्या कमी! राजा आदमी है.. संपत्ति का मालिक!”

गुब्बारा हवा में उड़ा दिया था। और अब ये रमेश नाम का गुब्बारा जिसमें माँ ने हवा भर रखी थी… बहुत ऊँची उड़ान भर चुका था।

रमा का घर इसी तमाशे में बसा था.. मुकाबला तो सुनीता का था..  दर्शनाजी के साथ। बहुत मुश्किल मुकाबला था… पक्की खिलाड़ी थी.. दर्शनादेवी! और रमेश अपनी माँ का ख़ास कुत्ता! फ़िर भी हर ताले की चाबी ऊपर वाले ने बना रखी है!  इसी सकारात्मक सोच को लेकर सुनीता टिकी हुई थी। और फ़िर पिता ने सुनिता से एक गुप्त वादा भी ले रखा था..

” हमें रमेश को छोड़ना बिल्कुल भी नहीं है! ठीक है! न बेटा! तू इसके बगैर महल खड़ा नहीं कर सकती.. तुझे घर बसाने का लिए इसकी ज़रूरत पड़ेगी! कितनी भी और कोई भी कीमत क्यों न देनी पड़ जाए! पर अपने परिवार को बचाकर घर बसा कर दिखाओ!’।

मुकेशजी सुनीता से इसी तरह की बातचीत किया करते थे.. जब कभी-भी वो इंदौर से मायके जाया करती थी। पिता की बातों से ऊपर होकर केवल सुनीता के पास एक ही जवाब हुआ था,” जी पिताजी!”।

इसके आगे न कोई शब्द और न ही कोई बहस!

मन में पिता के आगे.. बहुत सारे सवालों का सैलाब उठता था.. जिसे थामते हुए.. मुकेशजी का यही जवाब हुआ.. करता था.. सुनीता को.. ” तू परमात्मा के भरोसे आराम से वहाँ जाकर बैठ जा! जो भी कुछ जाना है! वो तो जाएगा ही!’।

और हर बार इन्हीं शब्दों के साथ सुनीता की विदाई हो जाया करती थी..

” मुझे वहाँ मत भेजो! वहाँ नाम का धंधा है! कुछ नहीं है!”

यह शब्द सुनीता के अंतसर्मन के ही हुआ करते थे.. जो वो किसी से भी कह नहीं पाई थी।

खैर! यह सब बातें और सोच अब पुरानी हो चली थी.. केवल मुकेशजी के ही शब्द हर बार और हर साल ताज़ा रहते थे।

प्रहलाद का दाखिला न होना ननिहाल में भी चर्चा का विषय बन कर रह गया था..

” बीस-पच्चीस लाख रुपए बहुत ज़्यादा होते हैं! उस फैक्ट्री में काम करने वाला सिर्फ़ विनीत ही है..! ये रमेश तो कुछ करता नहीं है.! ज़रूरी नहीं है.. इतने रुपए देकर पढ़ा जाए… ये ज़रूरी तो नहीं है! इंदौर में ही किसी कॉलेज में दाखिला लेकर प्रहलाद आगे बढ़ सकता है!’।

प्रहलाद के मामा सुनील ने प्रहलाद को विडियो कॉल पर समझाया था।

” पीछे जाकर डंडा दे..! तू चिल्ला..!! चिल्ला…!!”।

अरे! बाप रे! बाप..!! ऐसे क्यों चिल्ला रहा है.

भाई!

नए-नए नाटकों का पिटारा लिए.. हर दिन खानदान आपके साथ।

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