” मामले को ऐसे मत छोड़! प्रहलाद से कहकर थाने में कंप्लेंट दर्ज करवा.. कि इन्होंने बैंगलोर दाख़िले के पैसे नहीं दिए! प्रहलाद का भी हिस्सा बनता है.. वो थाने जाकर लिखित में शिकायत दर्ज करवा सकता है”।
धीमे और निराशा भरे स्वर में मुकेशजी ने सुनीता से फ़ोन पर बात की थी.. प्रहलाद का दाखिला न कराना मुकेशजी को बहुत ही बुरा लगा था.. इंदौर वालों के ना में जवाब ने उनका दिल तोड़ कर रख दिया था।
” पिताजी! प्रहलाद को कचहरी और थाने के चक्कर लगवा कर बर्बाद करने का कोई फ़ायदा नहीं है! कोई दूसरा रास्ता देख लेंगें!”।
सुनीता ने पिता से कहा था।
” वो तो ठीक है! पर जब ये अभी दाख़िले के पैसे नहीं दे रहे. तो कल को क्या करेंगें! इन बच्चों के शादी-ब्याह कैसे होंगें! कोर्ट में केस करना ज़रूरी है! और फ़िर बेटा! कल को ये तुझे कुछ भी नहीं देंगें! तो इतनी बड़ी दुनिया में तू कहाँ जाएगी!”।
मुकेशजी को सुनीता की बेहद चिंता हो गई थी.. आखिर पिता जो ठहरे! बात बिल्कुल पते की कर रहे थे.. लेकिन .. अगर कल को परिवार ने बेदखल कर दिया.. तो सुनीता कौन सा रास्ता लेगी.. यह तो वक्त ही बताने वाला था.. फ़िलहाल इस प्रश्न का उत्तर सुनीता के पास पिता को देने के लिए नहीं था।
” किसने बताया.. कि मेरे पास लाख रुपये आ गए हैं!”।
” जो रास्ता मिले.. उसी पर चल दो!”।
घर में फिर एकबार तमाशा.. और एक नई सलाह के साथ खानदान।

