लोन की कहानी जैसे-तैसे सुनीता ने दबा ली थी.. दोनों मां-बेटा घर आ गए थे.. गाँव से भी बस लाख रुपये का ही इंतेज़ाम हो पाया था। प्रहलाद के फ़ीस के पैसे पूरे नहीं हो पाए थे.. साथी मित्रों के पिताओं ने जैसे-तैसे अपनी जमा-पूँजी से अपने बेटों के दाख़िले करा दिए थे। पर प्रहलाद रह गया था.. मासूम बच्चे के मन में जो ख्याल आया.. वो उसनें सुनीता के आगे कह भी डाला था..
” दादी की ज़मीन के अगर पैसे बचे होते तो मेरा दाखिला आराम से हो जाता.. सारे पैसे लड़की पालने पर ही लगा डाले!”।
दाख़िले के पूरे पैसे तो नहीं मिले थे.. पर रमेश के हाथ में लाख रुपये ज़रूर आ गए थे। रमेश के चाचा के लड़के का फ़ोन सीधा प्रहलाद के पास आया था..
” भाई! पूरे पैसों का इंतेज़ाम तो नहीं हो सका! पर तूँ ये लाख रुपये जमा कर ले! अगले साल दाखिला करवा देंगें!”।
प्रहलाद ने तुरंत ही बात का जवाब देते हुए.. कहा था..
” चाचाजी! आपने पैसे पापा के बैंक में क्यों ट्रांसफर कर दिए.. वो तो अगले साल तक ही उड़ -खा लेंगें!”।
” कोई बात नहीं! तू वो पैसे अपने ताऊ को दिलवा दे! वो संभाल कर रखेगा!
रमेश के चचेरे भाई ने प्रहलाद को समझाते हुए.. ,कहा था।
रमेश के पास लाख रुपये ज़मीन के आ गए हैं! यह बात सुनीता की नासमझी से सारे घर में फैल गई थी।
” यो पैसे रमेश ने किस बात के मिल रे हैं! सालाना कमाई में तो सबका हिस्सा बनता है! और अगर ज़मीन गिरवी के सैं! तो फ़िर तो ये ब्याज चढ़ाते जाएँगे! और पहले दिन से ही चढ़ा लिया होगा.. इब तो बस! लिखना शुरू हो गया होगा! अगर उन्हें उनका ये कर्जा जो ज़मीन पर लिया है! नहीं मिला तो थोड़े पैसों पर साइन करा लेंगें! गई ज़मीन! वे लोग बहुत कुछ हैं!”।
दर्शनाजी ने सुनीता को ज़मीन का हिसाब-किताब समझाते हुए.. कहा था।
इधर रमेश के पास लाख रूपए आते ही उसे ज़मीन का लालच बढ़ गया था. प्रहलाद को भूलकर अपने बैंगलोर के नाम पर अपने पैसे बनाने की योजना बना बैठा था..
” अभी किसी को बैंगलोर के बारे में मत बताना! देखना.. इन गाँव वालों को बेवकूफ़ बना कर कितने पैसे इस प्रहलाद के दाखिले के नाम के खींचता हूँ!”।
” नहीं हुआ! प्रहलाद का बैंगलोर दाखिला! नहीं दिए.. विनीत ने पैसे..!! ओफ! ओ..!!”
प्रहलाद के दाखिला न होने से कोई ऐसा शख़्स था.. जिसे बेहद बुरा लगा था..
” इतनी बड़ी दुनिया में तू कहाँ जाएगी..!!”।
कौन इतना बेचैन और परेशान हो गया था.. सुनीता और बच्चों के भविष्य को लेकर।
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