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खानदान 143

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प्रहलाद का दाखिला घर में एक टेलीविज़न शो की तरह से हो गया था.. बजाय बच्चे को सही बताने के, उसकी मज़ाक ही बना कर रख दी थी। ननिहाल में भी ख़बर लागातार जा रही थी.. और उन्हें भी उम्मीद थी.. कि प्रहलाद का दाखिला रुक ही नहीं सकता। हालाँकि प्रहलाद के ममेरे भाई-बहन प्रहलाद को सही सलाह दे रहे थे.. कि तू वहीं दाखिला ले-ले.. पच्चीस-तीस लाख वाली डिग्री का आगे चलकर कोई फायदा होने वाला नहीं है। पर मुकेशजी और अनिताजी को बार-बार यही लग रहा था.. नहीं भई! हिस्सेदार है! दाखिला रुक ही नहीं सकता!

सुनीता ने प्रहलाद का दिमाग़ लाख बदली करने की कोशिश करी.. पर प्रहलाद के दिमाग़ में बैंगलोर दाखिला ही घर  कर गया था..

अपनी माँ की बात न मानते हुए.. बालक बुद्धि अपनी ताई के कमरे में दाखिल हो गया था.. चालक औरत अपने इरादे छुपाते हुए.. एकबार फ़िर प्रहलाद को कुर्सी पर बैठा बेवकूफ़ बनाने में लग गई थी..

” अभी तो फ़ीस भरने में टाइम है! और गाँव वाली ज़मीन में हिस्सा भी है! तू ऐसा कर.. हरियाणे पहुँच कर ज़मीन का सौदा करवा दे! तेरी पढ़ाई आराम से पूरी हो जाएगी! नहीं तो ये तो वैसे भी उड़ा खाएगा!’।

पैसे उड़ाने-खाने वाली बात रमेश के लिए बोली गई थी।

अब तो प्रहलाद के जैसे पंख ही लग गये थे.. ज़मीन बेचने का आईडिया सुन.. माँ के पास दौड़ा चला आया था.. प्रहलाद! और ताई का दिया हुआ.. सारा सलाह मशवरा बता भी दिया था.. सुनीता परिवार के इस खेल से थोड़ा अनजान प्रहलाद की बात सुन ख़ुश हो गई थी.. माँ-बेटों को अब दाख़िले की पूरी उम्मीद भी हो गई थी। शाम को रमेश के घर आते ही प्रहलाद ज़मीन को लेकर अपने पिता के पीछे हो लिया था.. और सुनीता सीधा रमा के पास पहुँची थी.. दर्शनाजी भी वहीं खड़ीं थीं..

” अरे! हाँ! मेरा कहना ये है! कि वो ज़मीन हमें ऐसे नहीं देंगें..!! और देखो! हमारी चीज़ है! हमें लेनी तो है! ही.. तू गाँव जा और तेरे तो माँ-बाप भी पढ़े-लिखे हैं! उन्हें बुलाकर पंचायत कर! इस रमेश को भेजने से काम बिल्कुल भी नहीं चलेगा! आराम से प्रहलाद की पढाई पूरी हो जाएगी!”।

रमा ने प्यार के साथ सुनीता को समझा दिया था.. और सुनीता ने भी रमा की दी हुई गोली गले से नीचे उतार ली थी..

” तूं फ़ोन पे बात कर! जमीन पे पैसे लेने हैं!”।

दाख़िले को लेकर बात जमीन पर आ पहुँची थी..  

चलो! अच्छा है! अगर प्रहलाद का दाखिला ज़मीन बेचकर हो जाता है.. तो!

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