प्रहलाद को अपने दाख़िले की चिंता लगातार सता रही थी.. माँ की बात तनिक भी दिमाग़ में नहीं बैठी थी.. कि इस बार इतने पैसों का मिलना मुश्किल काम है! दिमाग़ में न जाने किस दोस्त ने education loan वाली बात डाल दी थी..
” माँ! मेरे दिमाग़ में लोन लेने का ख्याल आया है… education loan मिल जाता है.. national level पर, बाद में धीरे-धीरे देते रहो!”।
” हम्म!”।
जम नहीं रहा था.. सुनीता को लोन वाला प्रहलाद का आईडिया! पर फ़िर भी बच्चे से कह ही दिया था..
” देख ले! कर ले बात! अपने ताऊजी से! “।
प्रहलाद भागा-भागा विनीत के पास पहुँचा था..
” ताऊजी! बैंक से लोन मिल रहा है! वो course पूरा होने के बाद धीर-धीरे दे सकते हैं!”।
” हाँ! सही रहेगा! तू जाकर बैंक से लोन की बात कर ले!”।
माँ-बेटों दोनों को ही विनीत की बात जच गयी थी.. और अगले ही दिन तीन-चार नैशनल बैंकों में लोन अप्लाई करने भागे थे.. बैंक ने भी अपनी condition सामने रखते हुए कहा था.. लोन तो मिल सकता है! पर ऐसे cases में कोई property mortgage करनी पड़ती है! और भी कारोबार से संबंधित बातें बोलीं थीं.. जो बिल्कुल ही नामुमकिन सी लग रहीं थीं.. बटवारा हुआ ही नहीं था.. नाम तो किसी के कुछ था, ही नहीं!
सुनीता की सोच सही दिशा में काम कर रही थी.. विनीत और प्रहलाद का दाखिला करवा दे! सुनने में भी बात जमती नहीं थी। खैर! बैंक लोन वाला आइडिया तो बेकार ही रहा!
जान तो रही थी.. सुनीता! कि विनीत बेवकूफ़ ही बना रहा है।
” अरे! इसका कॉलेज में admission करवाना है! कि नहीं!”।
बेटे को भागते हुए.. देखकर मुस्कुराते हुए.. रमेश से बोली थी.. सुनीता!
” अरे! मैंने बोला था.. पैसे देने के लिए! पहले तो इधर-उधर की बातें करने लगा.. फ़िर बोला.. अगर हम इस लड़के पर बीस-पच्चीस लाख रुपये लगा भी देते हैँ.. तो बेचनी तो इसने मूंगफली ही हैं!”।
प्रहलाद के लिए यह सब सुनकर सुनीता का ग़ुस्सा काबू न रहा था.. और एकबार रमेश के आगे भाषा का ध्यान न रखते हुए.. चिल्ला कर बोल पड़ी थी..
” ऐसे- कैसे बोल गया.. कि प्रहलाद मूंगफली बेचेगा! इसनें अपनी लड़कियों पर तो लाखों रुपये खर्च कर दिए!.. बात करते हैं! झूठ बोलते हैं!”।
एकपल के लिए सुनीता भूल चुकी थी.. बात हिस्से की है! जो कि मिलना ही नहीं था.. रमेश के नाटकों का हरजना आज बच्चे भुगतने को तैयार खड़े थे।
” काश! इन्होंने भी दादू के टाइम काम कर कुछ जोड़ कर रखा होता!”।
मासूम प्रहलाद पिता के लिए बोल ही बैठा था।
दोस्तों की लाखों की फीस जमा होकर दाख़िले हो चुके थे.. रईसों की औलाद नहीं थे.. प्रहलाद के दोस्त! पर फ़िर भी..
” तू पंचायत बिठा! तेरे माँ-बाप तो पढ़े-लिखे हैं! उन्हें बुला .. और तू ख़ुद जाकर बात कर! इनको बात करनी नहीं आती!”।
फ़िर एक नई सलाह के साथ आगे बढ़ता हुआ.. खानदान।

