दोनों हाथों से परिवर्तन को रोके हुए.. रामलाल विला की मालकिन.. श्रीमती दर्शनाजी! भला परिवर्तन की हिम्मत थी.. कि मैडम के होते हुए.. घर में दाखिल हो जाता।
रमेश के पैर का इलाज तो हो चुका था.. डॉक्टर ने रॉड निकलवाने के लिए कहकर छोड़ दिया था.. अब आगे तो रमेश की ही मर्ज़ी थी। रमेश पैसे को ही महत्व देने वाला आदमी थी.. बात साफ़ होती जा रही थी।
प्रहलाद का स्कूल ख़त्म हो चुका था.. और दाखिले के लिए बैंगलोर जाना चाहता था.. नाम आ गया था.. प्रहलाद का।
दाख़िले की फ़ीस.. पाँच-लाख रुपये थी..
और कोर्स का कुल खर्चा बीस से पच्चीस लाख तक आने वाला था। बच्चे को अपने दाख़िले पर पूरा भरोसा था.. होता भी क्यों नहीं! अब तक बचपन से महंगे स्कूलों में पढ़कर जो बड़ा हुआ था.. प्रहलाद!
” इस बार इतने पैसे नहीं मिलेंगे!”।
माँ ने प्रहलाद से कहा था।
” क्यों नहीं मिलेंगें! मेरा पिछले साल स्कूल में भी तो दाखिला नहीं करवाना चाहते थे.. पर हो ही गया!”।
प्रहलाद ने अपनी माँ से जिद्द भरे स्वर में कहा था.. सुनीता बच्चे से कुछ भी कह पाने में असमर्थ हो रही थी.. क्योंकि वो अंदर की बात जानती थी.. जानती थी.. रमेश का घर में कोई भी वजूद नहीं था.. और बच्चों के दादाजी संपत्ति को लेकर ऐसी कोई भी वसीयत नहीं बना कर गए थे.. जिसमें बच्चों के भविष्य को लेकर कोई बात हो! हाँ! सुनीता को एक बात बखूबी याद थी.. जब रामलालजी बीमार थे.. तो एकबार उन्होनें दर्शनाजी के सामने सुनीता से कहा था..
” हम ऐसी वसीयत बना कर जाएंगें! तुम देखना..! प्रहलाद जितना भी चाहे उतनी पढ़ाई कर सकता है”।
लेकिन एक अलग सी आवाज़ जो कि सही थी.. सुनीता के अंदर से आ रही थी.. जो वो स्पष्ट रूप से कहने और प्रहलाद को समझाने से डर रही थी..
” तेरे बाप ने कमा कर रखे हैं..! क्या!”।
परिवार को देखते हुए.. यही एक डर..! या फ़िर सच! उस इस डर और सच की चक्की में घूमता हुआ.. रमेश का परिवार..! लेकिन रमेश की सोच कौन से ख्याली पुलाव पका रही थी.. कौन रमेश से परिवार से अलग हांडी में खिचड़ी पकवा रहा था.. सभी रंगों को लिए आइये चलते हैं.. खानदान के साथ।
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