Pendrive का मामला हमेशा के लिए ख़त्म हो चुका था… सुनीता ने यह बात अपने ही अंदर रखी थी.. कि प्रहलाद ने pendrive flush कर दी है। बात कहीं नहीं जाने दी थी। लेकिन उस pendrive के अंदर ऐसा क्या देखा था.. प्रहलाद ने जो उसे बिना ही किसी को बताए pendrive को flush करना पड़ गया था.. और रमेश भी काफ़ी दिनों तक उस pendrive को लेकर काफ़ी परेशान और बेचैन रहा था। सुनीता जानने के लिए उत्सुक हो चुकी थी, कि आख़िर ऐसा क्या था.. उस pendrive में जो बच्चे ने देखते ही सीधा फ्लश कर दी.. और प्यार से सुनीता कुछ दिनों के बाद प्रहलाद से पूछ ही बैठी थी..
” चलो! जो हुआ सो हुआ.. मुझे नहीं बताओगे क्या था.. आख़िर उस pendrive में ऐसा ख़ास!’।
और प्रहलाद ने अपनी माँ की तरफ़ देखते हुए.. दबी हुई आवाज़ में थोड़ा घबराते हुए.. कहा था,” उस रात जब पापा घर नहीं आए थे.. और भी…
बच्चा इतना कहकर चुप हो गया था.. और वहाँ से निकल गया था.. सुनीता बात का इशारा समझते हुए, सारी कहानी समझ गई थी, और आगे पूछने की हिम्मत भी नहीं जुटा पायी थी.. याद आ गई थी, सुनीत को रात जो उसनें रंजना के साथ बिताई थी .. और किस तरह से घर से बहाना बना कर उस शाम को रंजना के पास चला गया था..
” अरे! मेरा वो दोस्त है! न! मुकेश.. कई दिनों से बीमार चल रहा है..! आज रात मुझे वहीं रूकना पड़ेगा..! ठीक है! देख लेना.!”।
रंजना इतनी भी नासमझ नहीं थी.. कि कुछ भी समझ नहीं पाती.. पर जानती थी.. बोलने का कोई भी फ़ायदा नहीं है! रमेश अगले दिन जब घर लौटा था.. तो बेहद खुश था.. माँ भी रमेश को देख कर सब समझ गई थी.. और बेटे को आँख के इशारे से बढ़ावा देते हुए, बोल उठी थी..
” रमेश..!!’
अब तो खैर! ईश्वर की कृपा से लड़की ने ख़ुद ही रमेश का पीछा छोड़ दिया था.. नहीं टिक पायी रमेश के घर के नाटक में!
पर आज भी रमेश के दिल-दिमाग़ से उस लड़की की छाप मिटी नहीं थी.. दिन भर के चोबीस घन्टे में एकबार ज़रूर याद कर लेता था.. उसको आख़िर कम समय नहीं पूरे पाँच साल बिताए थे.. रमेश ने उस लड़की के साथ।
लड़की बीच से हट चुकी थी.. नेहा और प्रहलाद भी अब बड़े हो चुके थे.. रास्ता साफ़ था.. मुद्दा था.. हिस्सा.!!
” मेरा हिस्सा..!! मेरा हिस्सा..!! अरे! यह भी तो आपका ही हिस्सा है!”।
अब किस बात को लेकर जानवरों की तरह से चिल्ला रहा था.. रमेश!
नया मोड़ खानदान में।

