” अभी तो यह pendrive का ही मामला है! सोच कर देख! आगे अगर लड़की को लेकर कोई बात निकल आई.. तो कितना हंगामा होगा! तेरे माँ-बाप तो पढ़े-लिखे हैं! तू उनसे बात करके कोई रास्ता निकाल..! इसके ख़िलाफ़ कोई पंचायत बैठा! तभी ये सीधा हो पाएगा!”।
रमा ने सुनिता को भड़काते हुए, कहा था।
” बता कहाँ है..!! Pendrive! तूने तो नहीं लगा दिया न काम! बता साले मुझे तो तेरे ऊपर भी शक है!”।
रमेश ग़ुस्से में लाल-पीला होते हुए, अब प्रहलाद की तरफ बढ़ा था.. क्यों प्रहलाद भी कम्प्यूटर वगरैह में लगा रहता था.. और वैसे भी रंजना के ख़िलाफ़ था.. रमेश जब प्रहलाद के ऊपर चिल्ला रहा था.. तो सुनीता ने प्रहलाद के चेहरे के हाव-भाव देख लिए थे.. और थोड़ा कुछ भाँप भी गई थी।
” बता दे बेटा..! अगर तेरे पास वो pendrive है! तो! नहीं तो ज़बरदस्त तमाशा हो जाएगा! मुझे बता..! मैं किसी और को यह बात बिल्कुल भी नहीं बताऊंगी!”।
सुनीता ने प्रहलाद को प्यार से समझाते हुए, कहा था। प्रहलाद ने थोडा घबरा कर अपनी माँ की आँखों में देखा था.. और फ़िर कहने लगा था,” माँ! तुम्हें याद है! जब गाँव से पापा की बुआजी आईं थीं.. और वो घर देखते हुए.. ऊपर कमरे में यहीं पापा के पास आ बैठीं थीं.. तुम्हें यह बात पता नहीं है! क्योंकि तुम उस वक्त रसोई में थीं.. और पापा को लगा था.. जैसे कि मैं सो रहा हूँ! पर माँ मैं सिर्फ़ सोने का नाटक ही कर रहा था.. असल में आँख बन्द किये में लेटा हुआ था.. पापा अपनी बुआजी से आप के ख़िलाफ़ बातें करने लगे हुए थे.. जो मैने सुन लीं थीं.. कह रहे थे,” न यह मुझे पसंद है! और न ही इसके घर वाले मुझे अच्छे लगते हैं! मैने तो अपनी पसंद ढूंढ रखी है! ये घर में रह लेगी! मैं तो मुझे संभालने वाली लेकर आ गया हूँ!”।
इतना सुनने के बाद मेरा ग़ुस्सा काबू में नहीं रहा था.. मैं आपे से बाहर हो गया था। वो पापा वाली pendrive मैने उनके पास देखी तो थी.. पर खोल कर चेक नहीं करी थी। बुआजी और पापा के कमरे से बाहर जाने के बाद पता नहीं अचानक से मेरे दिमाग़ में क्या आया था.. और मैने वो pendrive कंप्यूटर में लगा कर चेक कर ली थी..
बस…. और वो pendrive मैने flush कर दी माँ..! हमेशा के लिए..!!
प्रहलाद ने ऐसा क्या देखा.. उस pendrive में! जो उसे वो flush करनी पड़ गई थी.. pendrive के अंदर का राज़ अगले खानदान में ही जाने।

