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खानदान 123

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एक बहन का तो घर बस गया था, दूसरी बहन इंतेज़ार में बैठ-बैठ कर थक गई थी। बेचारी रंजना ने सीधे-सीधे भी रमेश से हिस्से का पूछ लिया था… पर कोई जवाब ही नहीं मिल पा रहा था। शादी-शुदा बहन के ठाठ-बाट देख.. रंजना की परेशानी बढ़ती जा रही थी।

” आपको पता है! ये रिश्ता मेरे लिये आया था.. मजे वो कर रही है!”।

रमेश से मिलने पर रंजना ने अपनी बहन के लिए कहा था.. अब भई! जिस हिसाब से रमेश ने अपने-आप को फैक्ट्री का मालिक बता रखा था.. उस हिसाब का रंजना को कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। और दूसरी तरफ़ बहन दुबई पहुँच गई थी.. रंजना को जलन तो होनी ही थी। खैर! अब बहुत हो चुका था.. रमेश की हिस्सेदारी का इंतेज़ार! रंजना ने कुछ दिन बहन के पास दुबई में बिताने के बारे में सोच लिया था..

” उसका पासपोर्ट बनेगा! और साथ में मेरा भी! हम अब दुबई में रहेंगें!”

” आपने नई बात सुनी! अम्माजी! अब ये उस लड़की के साथ दुबई जाने की बात कर रहें हैं!”।

एक बार फ़िर से सुनीता नासमझ छोटे बच्चे की  तरह से दर्शनाजी के पास रमेश की चुगली करने के लिये भागी थी.. कि वो रंजना के साथ दुबई भागने की तैयारी कर रहा है! हाँ! ये बात बिल्कुल सच थी.. रमेश ने रंजना से मिलकर दुबई जाने का हल्ला कर दिया था।

अब तो रमेश बाबू पासपोर्ट बनवाने की लाइन में लगने के लिये सुबह सवेरे ही तैयार होकर भागने लगे थे। भागते भी क्यों नहीं! मैडम का पासपोर्ट जो बनना था। रंजना ने अपने प्यारे और खास को पासपोर्ट बनाने के काम से लगा दिया था। रमेश की मेहनत रंग लाई थी.. और पासपोर्ट बन कर तैयार हो गया था। पासपोर्ट पर फ़िर एकबार सुनीता ने ताना कसा था..

” आपका कैसे होगा! बन गया क्या आपका पासपोर्ट!”।

” अरे! अभी कैसे बनेगा.. !! एक केस नहीं है! क्या! मेरे पर..!”

” हा! हा! हा..!!”।

रमेश का जवाब सुन सुनीता से रुका न गया था.. और ज़ोरों से हँस पड़ी थी।

क्या करती सुनीता भी! बेचारा मजनू यहीं रह जाएगा! और लैला उड़ान भरेगी।

रंजना के दुबई पहुँचने के बाद रमेश और रंजना की प्रेमकथा ने भी एक हसीन मोड़ लिया..

अब बातें और मुलाकातें वीडियो कॉल पर होने लगीं थीं।

” कौन था.. काला आदमी..!! सफ़ेद कमीज़ वाला”

” भाई! है! मेरा!”।

भाई और इस काले आदमी की गुथी सुलझाते हैं.. खानदान के अगले भाग में।

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