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जीने की राह – चार

लेकिन आज इन संकट के पलों में मैं महा ज्ञानी, मठाधीश और भूले भटकों को राह बताता सुझाता स्वयं ही राह भूल गया था और अंधा हो गया था।

“क्या .. क्या गुलनार मुझे ले कर डूब जाएगी?” मैं स्वयं से प्रश्न पूछ रहा था। “जब लोगों को पता चलेगा कि मैं और गुलनार ..? कितनी थू थू होगी? लोगों को अच्छा नहीं लगेगा जब उनका एक आदर्श टूटेगा!”

“कौन लेगा तुमसे आशीर्वाद पीतू?” कोई मुझ पर हंस रहा था। “पीताम्बर पहनकर पीताम्बर दास नहीं नहीं स्वामी पीताम्बर दास बने तुम रंगे सियार साबित हो जाओगे जब लोग जान जाएंगे कि ..”

“मैंने किसी को कब कहा कि मैं स्वामी पीताम्बर दास हूँ! लोगों ने मुझे खुद ही पहनने को कपड़े दिये, खड़ाऊं भेट किये ओर मुझे पीतू से पीताम्बर और फिर स्वामी पीताम्बर दास बना दिया!”

“तुम ने सब स्वीकारा नहीं? ढोंगी हो!”

“नहीं नहीं!” मैं अचानक जोरों से चीख पड़ा था। “पूछो, पूछो मॉं चंद्र भागा से, पूछो इन पीपल दास से, पंछियों से, जंगल से, हवा से, पानी से कि अगर मैंने कोई झूठ बोला हो तो! और तुम भी तो जानते हो कि मैंने अपने लिए कभी कुछ नहीं लिया! मैं तो .. मैं तो ..”

“क्या हुआ स्वामी जी?” मुरारि लाल ने मुझे छू कर पूछा है।

“तुम्हारी तरह मुझे भी मेरे पापों ने आ पकड़ा है, मुरारि!” मैंने बिलख कर कहा है। “प्रायश्चित करता हूँ!” कहकर मैं समाधिष्ट होने चला आया हूँ!

मन को जोर जबरदस्ती साधा है! प्रभु के चरणों में ला कर खड़ा किया है! दृष्टि को एकाग्र कर ध्यान को बांटा है! गुलनार को भूल मैंने गुरु के चरण गहे हैं!

अब लौटेगी शांति – मैं जानता हूँ! ये जीने की राह झूठी नहीं – जीने का परम पथ है!

मेजर कृपाल वर्मा

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