Site icon Praneta Publications Pvt. Ltd.

जीने की राह उनतालीस

दौड़ते दौड़ते, भागते भागते और एक के बाद दूसरी सफलता के सोपान चढ़ते चढ़ते मैं अचानक ही औंधे मुंह आ गिरा था। सफलता की सीढ़ी कुल चार कदम पर थी लेकिन अब उसे छूना तक दुश्वार हो गया था।

“तेरा काल तेरे सर पर आ बैठा है पीतू!” मुझे अपने भीतर से आवाज आई थी। “अब परिवार में तेरी दरकार नहीं रही!” मुझे पता चल गया था।

लेकिन मैं कहां जाता? गुलनार के सिवा मेरी तो कोई और मंजिल ही नहीं थी। मैंने तो जैसे संसार में आ कर केवल गुलनार को ही जाना था, उसे ही माना था और अपना ध्येय समझ लिया था। गुलनार की ही बारी फुलवारी का मैं जैसे मालिक था और उस महकते गुलशन का अकेला ही माली था। लेकिन अचानक ..

“कित्ती बदनामी हुई है!” बबलू पागल हो गया था। वह उस लड़की से प्यार करता था। “मैं कैसे जीयुंगा मॉं!” मैंने उसे सुबकते सुना था।

“किस्मत पर भरोसा रख बेटे!” गुलनार बबलू को समझा रही थी। “और देगा दाता!” उसने बबलू को सांत्वना दी थी।

अब मेरा जिक्र कहीं नहीं था। अब उन सब का दाता कोई और था – मैं नहीं!

मैंने अपने आप को बहुत कोसा था। मैं उन सब को दुख तो देना ही नहीं चाहता था। मैं तो अपने प्राण तक न्योछावर करने को तैयार था। लेकिन .. पव्वा .. मेरे पीछे पड़ा था और मैं अवश्य था .. विवश था! और अब मेरी सूनी सूनी दुनिया का प्रकाश गुलनार नहीं थी – पव्वा ही था। मुझे कोई पूछता ही कब था? मैं तो अपने आप में ही सिमट गया था। गुलनार भी कभी कभार काम के लिए ही मुझे पुकारती थी वरना तो मैं उसके लिए एक भूली याद के सिवा कुछ न था।

अब पव्वा पीते ही मेरे रंगीन सपने लौट आते थे। मैं निश्चिंत हो जाता था। मेरे दिमाग में एक एक अजब गजब की हलचल पैदा हो जाती थी। और मैं वह सब भोगता था जो मुझे मिलता नहीं था और हैरानी इस बात की थी कि पव्वा इसे पल छिन में हाजिर कर देता था।

मैं पव्वा पीने के बाद तो बादशाह होता था।

और पव्वा के गम में ही मैं बादशाह अपनी बादशाहत गंवा बैठा था। मैं मर गया था – गुलनार के लिए और अपने चारों बेटों के लिए! मैं उन सब की आंखों के सामने मरा था लेकिन मेरे लिए रोया कोई नहीं था। यहां तक कि गुलनार की सूखी बेपरवाह आंखों में न तो कोई गम था और न कोई असमंजस! उसकी वो निरासक्त दृष्टि अजनबी नहीं थी! आज तो ..

अब क्या करूं? लौट जाऊं गुलनार के पास ..

अचानक ही अनेकानेक जीने की राहें मेरी आंखों के सामने बिछ गई हैं, मुझे बुला रही हैं, लुभा रही हैं और न जाने किन अनाम सुखों के नाम मुझे गिना रही हैं जो मुझे आज मिल सकते हैं! लेकिन पीपल दास से तो पूछना ही पड़ेगा – मुड़ने से पहले!

मेजर कृपाल वर्मा
Exit mobile version