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जीने की राह तेरह

लोगों ने मेरी कुटिया को बड़े करीने से बनाया था!

तीनों ओर मोखे छेक दिये थे। हवा और रोशनी का खूब आगमन था। सामने का दरवाजा चंद्र प्रभा की ओर खुलता था। मुझे भीतर बैठे बैठे ही वैकुंठ दिखाई दे जाता था। लेकिन आज न जाने कैसे और क्यों मुझे भोजपुर दिखाई दे रहा था।

वही कमरा नम्बर 24 था और वही थे हम दोनों – पीतू और गुलनार – जो खुशी से रह सह रहे थे। तभी मैंने महसूसा था कि गुलनार का हुस्न फूट निकला था। गाल लाल होने लगे थे, आंखें चंचल और चितवन कटीली हो गई थी। छातियों के उभार उचक कर आगे आ गये थे। खुले गेसुओं को जब गुलनार कंधों पर डालकर ठुमक ठुमक कर चलती थी तो मेरा मन न जाने कैसा कैसा हो आता था!

भोजपुर मुझे भा गया था। नदी थी, पहाड़ थे, बस्ती थी और सामने एक बड़ा बगीचा भी था जहां हम दोनों दिन बिताते थे। शाम को जब सुनहरे बादल पहाड़ों की किनोरों पर आ चिपकते तो पूरा वनांतर दहक उठता।

मंदिर में भी खूब चहल पहल रहती थी। ढ़ेरों चढ़ावा आता था। भेंट आती थीं। इस मंदिर की मान्यता थी और स्वामी श्रीनाथ जी का भंडार हमेशा भरा ही रहता था! कमाल ये था कि स्वामी जी बिना किसी को कुछ पूछे उसे सब कुछ दे डालते थे!

हम दोनों अपने स्वर्ग में निफराम सोते थे। गुलनार सोते वक्त मेरा सिर सहलाती थी तो मैं गहरी निद्रा में निमग्न हो जाता था।

लेकिन आज कल जब कभी मैं गुलनार के गदराए अंग प्रत्यंगों पर नजर डालता था तो वो शर्मसार हो जाती थी। उसका चेहरा आरक्त हो जाता था और वो लजा जाती थी। फिर वो मेरी निगाहें बचा कर हंस जाती थी।

मेरा मन न जाने कब बेईमान हुआ और रात के उस एकांत में जब गुलनार ने मुझे सुला कर सोना चाहा था तो मैं चुपचाप चोरों की तरह उसे यहां वहां छूने लगा था – चूमने लगा था। मेरा मन मस्ती पर उतर आया था। गुलनार ने खूब सोने का बहाना किया था लेकिन मैं न माना था।

अचानक गुलनार बिस्तर पर उठकर बैठ गई थी।

मुझे समझ आते देर न लगी थी। मेरा मन तो मुझे अकेला छोड़ कर कब का भाग गया था। अब जूते तो सर ने खाने थे! मैं सन्न् मन्न् पड़ा ही रहा था। मैं हिला तक न था। मैं बहुत डरा हुआ था। न जाने गुलनार क्या कहेगी – मैं सोच ही न पा रहा था। एक बारगी मन हुआ था कि उठूं और भाग जाऊं – कमरे से बाहर .. दुनिया के किसी छोर पर जाकर बैठ जाऊं जहां गुलनार मुझे पकड़ ही न सके!

“शादी के बाद होता है – ये काम!” गुलनार ने ऊंची आवाज में कहा था।

मैं चुप था। बेसुध था और बेहोश था!

गुलनार बिस्तर से उठी थी और जमीन पर जाकर सो रही थी। लेकिन मैं उस समूची रात सोया ही न था!

“शादी ..?” मैंने इस प्रश्न को ऊंगलियों में लेकर दोहराया था लेकिन मुझे कहीं भी ढोल ढमाके बजते सुनाई न दिये थे!

“उसको चल कर देख लो, स्वामी जी!” शंकर ने मेरा ध्यान तोड़ा था। “मर न जाए तभी है!” वह कह रहा था। “एक बार आप सर पर हाथ रख दो फिर मरे या बचे!” शंकर की राय थी।

और जब मैंने गुलनार के पास पहुंच कर उसके माथे पर आशीर्वाद का हाथ धरा था तो उसने आंखें खोल ली थीं!

उस एक पल के लिए मैं अंधा हो गया था!

मेजर कृपाल वर्मा

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