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जीने की राह इक्कीस

न जाने क्यों आज मैं जल्दी जगा हूँ। न जाने क्यों आज मैं बहुत प्रसन्न और प्रफुल्लित हूँ। सूरज तो न जाने कब उगेगा पर मेरे मन आकाश पर तो अजीब और अनेकों सूरज उग आये हैं। और न जाने क्यों मैं ..

“इतनी जल्दी नहाने चले आये आज?” नदिया ने प्रश्न पूछा है।

“आज शनिवार है न!” मैंने अचानक उत्तर उगल दिया है।

“तो ..?” नदिया नहीं मानी है और उसने फिर से प्रश्न पूछा है।

“तो .. तो ..?” अब मेरा शर्माना स्वाभाविक है। अब मैं दिये उत्तर को चुरा लेना चाहता हूँ। मैं अब बात बदल देना चाहता हूँ। लेकिन नदिया से झूठ बोलना तो पाप होगा। नदिया ने ही तो मुझे जीवन दान दिया था और नदिया ने ही तो मुझे पाला पोसा है। “तो आज आश्रम में कीर्तन होगा।” मैंने धीमे से कहा है।

“और गुलनार आएगी?” नदिया ने शरारती स्वर में पूछा है।

“हॉं!” मैंने स्वीकारा है लेकिन मैं घबरा गया हूँ। यूं नदिया मेरी चोरी पकड़ लेगी मुझे तो विश्वास ही न था। “वह आएगी न कीर्तन में!” मैंने नदिया को बता दिया है।

अब फिर से मुझे एक आश्चर्य ने आकर घेर लिया है।

मेरे अंग प्रत्यंग में एक पुलक भरा है। जबान पर कई बार गुलनार के लिए परम प्रिय संवाद उगे हैं पर मैंने ही उन्हें अस्वीकार कर दिया है। मन ने तो बार बार कहा है कि मैं किसी तरह गुलनार को छू कर देखूं! मैं .. देखूं तो कि गुलनार ..

“फिर से बसा लो अपना संसार पीतू!” नदिया ने मुझे सलाह दी है। “बुला लो अपने चारों बेटों को!” वह बता रही है। “आश्रम की अकूत आमदनी है। तुम्हारा नाम तो चल पड़ा है। काम तो चलेगा ही। आश्रम का विस्तार होता ही चला जाएगा। देश के चारों छोर पर चार मठ बना दो और बांट देना चारों बेटों के बीच। चलन तो यही चल रहा है देश में! सब नाम और नम्बर के पीछे ही तो भाग रहे हैं पीतू?”

और फिर मैं और गुलनार, हमारे चारों बेटे और हमारे आश्रमों का सिलसिला मुझे घेर कर खड़ा हो जाता है!

“उत्तम स्वप्न है – संत शिरोमणि!” नदिया हंस पड़ी है।

न जाने मैं कब नहा लिया हूँ। न जाने मैं आज आश्रम में क्या क्या करता रहा हूँ। लेकिन .. लेकिन न जाने क्यों हर बार ही मेरी आंखें बंद होकर खुलती हैं। मैं होते कीर्तन की गूंज नहीं सुनता हूँ। मैं .. मैं गुलनार की आंखों में आंखें डाल कर नदिया के बताए आश्रमों को खोज रहा हूँ। मैं .. सोच रहा हूँ कि ..

लो! अब मैं सशरीर कीर्तन में आ बैठा हूँ। मैंने बहुत पहले ही आंखें बंद कर ली हैं। मैं अब आंखें खोलने का अवसर तलाश रहा हूँ। मैं अब मान रहा हूँ कि गुलनार ठीक मेरे सामने आ बैठी है। और .. और शायद वह भी मेरे आंखें खोलने के इंतजार में है।

मैंने आंखें खोल दी हैं। लेकिन .. लेकिन गुलनार की खुलती आंखें तो कहीं नहीं हैं। सामने तो सूना सूना एक सपाट है। नए नए चेहरे हैं। बेगाने से लोग हैं जो गला फाड़ फाड़ कर गा रहे हैं – न तन पर लँगोटी न मन पर मनौती नंगे पांव सुदामा चला आ रहा है! कन्हैया से कह दो अरे द्वार पालों कि ..

लगता है आज गुलनार नहीं आई!

“कुछ समझे भी मूर्ख राज?” मेरा कान पकड़े मेरा गुरु पीपल दास मुझसे पूछ रहा है। “कृष्ण को सुदामा क्यों प्यारा था?”

“गलती हुई गुरु जी!” मैं स्वप्न से जगा हूँ। “माया है – गुलनार और चार बेटे मोह पाश हैं।” मैंने मान लिया है।

कितनी आसानी से भटक जाते हैं हम जीने की अपनी सच्ची राह से। माया और मोह हमें आसानी से छोड़ कर नहीं देता।

मेजर कृपाल वर्मा
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