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जीने की राह छत्तीस

अब मेरे मन ने मेरे तीन संकल्पों को सहजता से स्वीकार कर लिया है।

भक्ति में रम जाता है और खूब डूब डूब कर आनंद लेता है। ब्रह्मचर्य का भी पूर्ण रूपेण पालन करता है। भटकना छोड़ दिया है और ब्रह्मचर्य के महत्व को समझ लिया है। जहां तक विपुल वैराग्य का प्रश्न है तो अब इसे कुछ नहीं चाहिये। सब कुछ प्रभु का है – इसने अब इस बात को स्वीकार लिया है।

विषय वासनाओं से यों मुक्त हुआ मैं अब अपना पूरा ध्यान निस्वार्थ सेवा पर ही केंद्रित करता हूँ और पूरे मनोयोग से आश्रम में आये श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देता हूँ। मुझे यह एहसास रहता है कि मैं जो भी हाथ उठा कर कहता हूँ या कि सोचता हूँ प्रभु उसे पूरा करते हैं और मेरे संचित सुखों और सौहार्द में से ही मेरी मर्जी के मुताबिक भक्तों में बांट देते हैं।

आस्था ही एक ऐसा आधार है जहां आ कर हम सब टिक जाते हैं।

मैं अपनी भक्ति और शक्ति अपनी दिनचर्या से ही प्राप्त करता हूँ। मैं प्रातः नींद त्याग कर तारों की छांव में निकलता हूँ और चंद्र प्रभा के शीतल जल में घर्षण स्नान करता हूँ। मन की शांति के साथ साथ मुझे आनंद और स्फूर्ति प्राप्त होती है। फिर मैं ध्यान में बैठ कर प्रभु से संपर्क करता हूँ और मन को खुला छोड़ कर उनके चरणों में समर्पित होकर भक्ति का प्रसाद पा लेता हूँ।

अब शंकर आकर मुझे इनाम बतौर चाय पिला देता है।

सूर्य देव को उदय होते लम्बे लमहों तक देखता हूँ और उनके ज्योति पुंजों से सामर्थ्य समेटता हूँ। शरीर असीमित सुख पाता है और शक्ति प्रदान करता है। पीपल दास भी मुझे आशीर्वाद देना नहीं भूलते और एक विचित्र सामर्थ्य का बंटवारा मेरे साथ हर दिन कर लेते हैं। हम दोनों का मार्ग और महत्व एक ही है।

आश्रम में चहल पहल का विस्तार भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने तक सीमित रहता है। हम सब एक निष्ठा के साथ कामना करते हैं कि जो भी भक्त यहां आस लेकर आये खाली न जाए। और ये हमारी सामूहिक शुभकामनाएं ही अपने अपूर्ण मनोरथों द्वारा परास्त किये उन महारथियों को फिर से लड़ने का होंसला थमा देती हैं।

आज शनिवार है ओर मैं हमेशा की तरह बहुत प्रसन्न हूँ। आज कीर्तन होगा मैं जानता हूँ और जमा होते लोगों के हुजूम को देख प्रफुल्लित हो उठा हूँ।

हरे रामा हरे कृष्णा कृष्ण कृष्ण हरे हरे की ध्वनि मेरे अंतःकरण में प्रवेश पा गई है। अब मैं झूम रहा हूँ, गा रहा हूँ और मेरा मन नाचने को भी है। कृष्णमय होने के बाद मेरा आपा भूल जाना स्वाभाविक है। कीर्तन का सामूहिक आनंद एक अलग ही बात है। आत्म विस्मृति के इन पलों में मन प्राण से प्रभु में रमा मैं भूल ही जाता हूँ कि जीवन में इस पल के बाद कुछ और भी होगा।

बंशी बाबू मुझ से हटकर हैं। उन्हें सारी व्यवस्था जो करनी है। कीर्तन के बाद प्रसाद वितरण भी उनके लिए विशिष्ट कार्य है। शंकर आया है तो मैं उठा हूँ। प्रसाद थालों में सजा है। मैं प्रसाद बांटने लगा हूँ और .. और .. गुलनार! प्रसाद लेने सामने आ गई गुलनार को देख मैं बेहोश होने को हूँ। उसने अपना आंचल संभाला है तो मैं उसकी आंखों में उतर गया हूँ। हमारी निगाहें मिली हैं तो वो मुझ में व्याप्त हो गई है। पलकें ढाल कर उसने हमारे पुराने पूर्ण परिचय का प्रमाण दिया है तो मैंने भी प्रसाद देते वक्त उसकी उंगलियों का स्पर्श किया है।

पागल मन, बागी मन, ओर बेईमान मन माना ही नहीं है और सारी रस्में और कसमें तोड़ कर गुलनार से जा मिला है।

अब जीने की कौन सी राह गहूं और किधर जाऊं – आप ही बताइये!

मेजर कृपाल वर्मा
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