
मैं मुसलमान नहीं बनूँगा , शेख साहब !
"तोपों के लिए बारूद बनती है, शोरे से !" शेख शामी पिता जी को समझा रहा है . "अब तो माल मनों में बिकने लगा है . आप भी अब धंधा बढ़ा दें ." उस ने सुझाव दिया है . "जितना भी माल हो , मेरा ! उस ने हंस कर कहा है . "और पैसे मैं पहले दूंगा ." उस ने महत्वपूर्ण घोषणा की है !
पिता जी की लार को टपकते मैंने देख लिया है . आते धन के अम्बार मुझे भी दिखाई दे गए हैं . लेकिन …कहीं ये शेख शामी लालच के बकरे तो नहीं बाँध रहा …? कहीं फंसा तो नहीं रहा …? मुसलमान है . सिकंदर लोधी का ख़ास माना जाता है ! और 'बोधन' के मरे अभी वक्त भी कितना गुजरा है ….?
"मैं अब किसी झंझट में पड़ना नहीं चाहता , शेख साहब !" पिता जी ने बड़े ही विरक्त भाव से शेख शामी के डील डॉल को देखा है . "दो जून की रोटी मिल रही है !" बड़े ही सरल भाव से कह रहे हैं पिता जी . "और क्या चाहिए , इन्सान को ….?" उन्होंने बड़े ही तृप्त भाव से कहा है .
मुझे भी पिता जी का दिया उत्तर जंच गया है !
"यही तो खोट है , हिन्दूओं में !" बिगड़ा है , शेख शामी . उस के तेवर तनिक तन आए हैं . वह अपने आप में फैला है …संभला है ….और उस ने आस-पास को निहारा है . आँखों में भर आई निराशा को समेट उस ने फिर से वार किया है . "कुच्छ चाहिए नहीं ….!!" उस ने जुमला जैसा कसा है . उस ने अपने हाथों को हवा में फैलाया है . "लोग बाहर से आ आ कर सल्तनतें कायम कर रहे हैं ! एक एक गज ज़मीन पर जंगे हो रही हैं !! जानें जा रही हैं ….और एक आप हैं कि …." उस ने पिता जी को गौर से देखा है .
"डर लगता है , शेख साहब !" पिता जी ने सच-सच बयान किया है . शेख शामी के आने मात्र से फिजा पर खौप जैसा कुछ छ गया है . लोगों को सिकंदर लोधी की ही चली कोई चाल -सा लग रहा है – शेख शामी . "सच्ची बात ये है कि ….सिकंदर लोधी का रवैया …." पिता जी ठहर गए हैं . जैसे सिकंदर लोधी का नाम उन के गले में अटक गया हो , वह चुप हैं !!
पिता जी ने ठीक पत्ते फेंके हैं . चोर की नहीं ….चोर की माँ की चर्चा होनी चाहिए !! त्रसित हिन्दू समाज के लिए तो एक 'खौप' ही है सिकंदर लोधी ! कुछ कर भी लेंगे लोग तो लगान में ले लेगा . नहीं तो लूट-पाट हो जाएगी . हिन्दू तो पनपेगा ही नहीं !!
"बात तो आप की दुरुस्त है , चौधरी साहेब !" स्वीकार में सर हिलाया है , शेख शामी ने . उस ने कहीं दूर देखा है . लगा है – जैसे सिकंदर लोधी उस के पास आ बैठा हो . "अगर कल को मैं आप से ही कहूं ….कि 'एक साम्राज्य खड़ा करो' …तो आप क्या करेंगे …?" एक बेहद माकूल प्रश्न सामने रख दिया है , शेख शामी ने .
इस प्रश्न के सामने आते ही पिता जी घबरा गए हैं . जटिल प्रश्न है . आम आदमी को इस का उत्तर सूझ भी कैसे सकता है ? प्रजा और राजा – दो अलग-अलग अखाड़े हैं . दोनों जहाँ जा कर मिलते हैं – वहीँ से सियासत का खेल शुरू होता है ! दोनों गौड़ हैं …पर गुनी हैं . और दोनों का होना भी अनिवार्य है !
"सियासत …!" शेख शामी ने एक सोच से उबरते हुए कहा है . "बड़ा ही खतरनाक खेल है, चौधरी साहेब !" उस ने अपनी आँखें नचाई हैं . "बहुत ही खतरनाक !!" उस ने अपनी बात की पुष्टि की है . "सिकंदर लोधी कहीं गलत नहीं है !" बड़े ही आत्म विश्वास के साथ कहा है , शेख शामी ने . "मैंने बड़े नज़दीक से देखा है , ये खेल ! सच कहता हूँ , चौधरी साहेब ! बादशाह बनना कोई आसान काम नहीं !! निरा पागलपन है …" उस ने अपनी आँखें बंद कर लीं हैं .
"फिर गुरु जी मुझे क्यों बादशाह बनने को कह रहे हैं ….?" मैंने अपने आप से प्रश्न पूछा है . "काँटों भरा ताज मैं ही क्यों पहनू …?" मैंने अपने पिता जी को सम्मान पूर्वक देखा है . "दो जून की रोटी …केसर की ढाणी …और वहीं बिखरा वो सुख-साम्राज्य ….नसीव हो जाए तो ….."
"आप के इस बेटे का क्या नाम है ?" सेख साहब ने बात का रुख मोड़ दिया है . अब वो मुझे गौर से देख रहे हैं . "मेरे पास आओ , बेटे !" शेख साहब ने मुझे पुकार-सा लिया है . मैं तनिक घबरा गया हूँ . मैं शेख शामी के पास जाने से डर रहा हूँ . मुझे ये आदमी कोई जादूगर जैसा लगा है . "डरो मत ! आओ ….!!" उस ने मुझे बुला ही लिया है . "क्या नाम है , तुम्हारा …?" उस ने अब मुझ से पूछा है .
"हेमूं ….!" मैंने लजाते हुए उत्तर दिया है .
"बड़ा अच्छा नाम है !" शेख शामी ने मुझे देखते हुए कहा है . "छोटा ….सीधा ….और सच्चा …!" उस ने मेरे नाम को सराहा है . "होनहार ….हो !" अनायास ही उस के मुंह से शब्द टूटे हैं . वह अब मुझे विमोहक द्रष्टि से देख रहा है . "चौधरी जी ! मैं दावे के साथ कह सकता हूँ ….कि हेमूं किस्मत का धनी है !" उस ने मुझे आशीर्वाद जैसा दिया है . "मुझे देदो , हेमूं को …..! हीरे की तरह तरांस दूंगा , इसे !!" उस ने अब पिता जी को देखा है . "फिर आप देखना ….."
"मुसलमान बनाएगा , तुझे !" मेरे विवेक ने फन मारा है . "प्रेम को भी तो बहादुर खान बनाया है ! ये इस की चाल है , हेमूं !! फँस मत जाना !!!" मुझे चेतावनी मिली है .
"मैं मुसलमान नहीं बनूँगा , शेख साहब ! " मूक संवाद मेरे मन में फूटे हैं . "चाहे मेरी जान जाए …..मैं बोधन की तरह जिन्दा जला दिया जाऊं ……पर मैं मुसलमान नहीं बनूँगा !!"
हल-चल है . लोग मान रहे हैं कि शेख शामी के आने का ख़ास मकसद है . धर्म परिवर्तन …सिकंदर लोधी का सब से बड़ा मुद्दा है . शेख शामी भी वही करेगा . लोगों को तरह-तरह के लालच दे कर ….सिकंदर लोधी का दिया काम पूरा कर के जाएगा !
घर में माँ का रोना-पीटना आरंभ हो गया है ! उन्हें जंच गया है …कि उन का एक बेटा – हेमूं मुसलमान बनेगा …..और शेख शामी उसे अपने साथ दिल्ली ले जाएगा !!
मेरे भी पैर उखड गए हैं . मैं घबरा गया हूँ . जैसे मुझ पर कोई गाज गिरने वाली हो ….ऐसा लग रहा है ! मेरे प्राण सूखते जा रहे हैं . गला खुश्क हो गया है . जब कोई उपाय समझ नहीं आया है तो मैं भाग निकलता हूँ . मैं गुरु लाल गढ़ी की और भागता ही जा रहा हूँ . मैंने गुरु लाल गढ़ी पहुँच कर ही दम लिया है . गुरु जी भी मिल गए हैं !!
"सवा सत्यानाश …..!!" मैं हाथ पीट कर ज़मीन पर गिरा हूँ . "सारा गुड ….गोबर ….!!" मैंने सांस संभाल कर कहा है . "गुरु जी ……" मैं अब आगे बोल नहीं पा रहा हूँ .
"हुआ क्या ….?" गुरु जी ने मेरा बुरा हाल देख पूछा है . "इस बार शेख शामी ने कौनसी गाज गिरा दी ….?" गुरु जी ने पूछा है . शेख शामी के आने की सूचना हर कान तक पहुँच चुकी थी . "मुझे तो पहले ही डर था . इस का तो आना ही मुझे दहला गया था !" अब गुरु जी ने मुझे देखा है . "ये सिकंदर लोधी का ख़ास है . दलाल है . व्यापारी है …पर है -शातिर ! कहता क्या है …?"
"नें …म …म ..मैं ….मुझे ….माने कि मुझे …ले जाएगा !" मैंने कठिनाई से ही अपनी बात कही है .
"कहाँ …?"
"दिल्ली …!!"
"क्यों…?"
"व्यापार का बहाना है ! शोरे का व्यापार !! कहता है – तोपों की बारूद बनती है , शोरे से ! खपत है . खूब पैसा …और नकद देगा ! मुझे भी दिल्ली लेजा कर व्यापार सिखाएगा ….अपने लड़कों के साथ रख कर सब भीतर बाहर का काम समझाएगा !" मैंने ताबड-तोबड़ में सब कुछ उगल दिया है . मैं तनिक हल्का हुआ लगा हूँ .
गुरु जी गंभीर हैं . मेरी बातों को उठा-पलट कर अर्थ निकालते लग रहे हैं . उन का चेहरा प्रदीप्त है . उन का संसार सजग है …!!
"बहुत खूब …!" गुरु जी बोले हैं . "सुंदर ….., बेहद सुंदर ….!!" वह जैसे स्वयं से कुछ कह रहे हों , ऐसा लगा है . "मान लो उस की बात !!" गुरु जी सहज हैं . "मैं भी तो यही चाहता रहा हूँ कि …कैसे भी ….तुम दिल्ली जाओ ! और स्वयं …देखो …सोचो …और …महसूसो ….! इस के बाद ही हम अपनी मुहीम को अंतिम रूप देते चले जांयगे ….! जाओ , तुम उस के साथ जाओ !!" गुरु जी ने मुझे आशीर्वाद जैसा दिया है . वह बेहद प्रसन्न हैं .
पर मैं सकते में आ गया हूँ . गुरु जी का कहा सब मेरी समझ में नहीं आया है . में अभी भी शेख शामी को चालबाज़ ….धोखेबाज़ ….और सिकंदर लोधी का दलाल मान कर बैठा हूँ . मैं रोने लगा हूँ …..
"रोओ मत , हेमूं !!" गुरु जी ने अब मेरे सर पर अपना हाथ रख दिया है . "भगवान् का भेजा ये एक अनमोल मौका है !" वह बता रहे थे . "यहाँ बैठे-बैठे कुछ नहीं होगा !" उन्होंने कहीं दूर देखा है . "अरे, ये तुर्क, अफगान और मुग़ल-पठान भी तो ….न जाने कहाँ-कहाँ से …घोड़ों पर सवार हो-हो कर …यहाँ चले आते हैं ! लूट-पाट करते हैं …. और फिर साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं !!" उन्होंने मुझे उठाया है . बांहों में भरा है . "दिल्ली जाओ ! साम्राज्य की नींव डालो !! फिर हिन्दू राष्ट्र का शिलान्यास करते हैं …!!"
बहुत प्रसन्न हैं , गुरु जी !!!
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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!
