बांका वीर
अवोध शिशु की तरह राजन अपने बैड रूम में सोया पड़ा है . घर ….समूचा घर प्रशांत ख़ामोशी में डूबा है , निःशब्द हुए वातावरण में , ‘प्यार’ शब्द अचानक ही उग आया है. सावित्री को खूब याद है …..जब इसी ‘प्यार’ के शब्द ने उसे बांह पकड़ कर उठा लिया था. न जाने कैसे …भक्क -से उस की आँखों के सामने प्रेम के उजाले आ खड़े हुए थे. और उस ने पहली बार …राजन के साथ खड़े हो कर …उन्हें निहारा था….सराहा था ! कितने खूबसूरत थे …..वो प्रेम-प्रसंग ….कितनी पवित्र थीं – वो भावनाएं …और कितने-कितने सजीले – छबीले थे …वो दिन …! दीपावली का अवसर था. कलकत्ता – हर रात दीपकों की रोशनी में जग-मग ,जग-मग करता था …..और उस का मन …हर रात राजन के आने की आहटें टटोलता रहता था. राजन के हर हाव-भाव का अब वह अर्थ लगाने लगी थी….हर आहाट को पहँचान ने लगी थी. वह जानने लगी थी कि ….राजन के उस के जीवन में आने के क्या अभिप्राय थे ? राजन की कटीली मुस्कान का उत्तर अनायास ही उस की मदभरी आँखें देने लगी थीं.
जवानी की दी दस्तक को सावित्री के खुले कानों ने जब सुना था – तब राजन ने उसे पहली बार ….अपने आगोश में लिया था …..फूल की तरह अधर उठा लिया था……कलेजे से लगा लिया था ….और वह राजन के चौड़े सीने से चिपक ….उस के पुरूषार्थ को पहँचान गई थी.
“हारेगा …..नहीं ….ये आदमी ….!” कर्नल जेम्स ने सावित्री की माँ – गीता को आश्वासन दिया था. “व्यर्थ में डर रहे हैं …., सेठ जी !” वह हँसे थे. “चूहे की तरह ….बिल में छुप जाने से …..कयामतें कम नहीं हो जातीं ….!”
“ऐसा नहीं है , कर्नल साहब !” गीता मुस्कराई थी. “सेठ जी न ….ज्यादा गम बर्दास्त कर पाते हैं …..न ज्यादा ख़ुशी …! पूजा-पाठ के सहारे चलते हैं .”
“और ….आप ….?” कर्नल जेम्स ने सावित्री से प्रश्न पूछ लिया था.
“मैं …नहीं …मानती – इन ढोंग-ढकोसलों को .” दो टूक उत्तर था , उस का .
लेकिन …..सावित्री को याद है – जब छोटी पूजा-अर्चना के बाद माँ ने राजन को विजई होने का आशीर्वाद दिया था ….तो उस ने भी चुपके से भगवान् से कहा था, “इन्हें …निराश मत करना , भगवान !” उस के बाद तो सावित्री की अजीव हालत थी. उसे कुछ कहते ही न बना था . शब्द ही न टूटे थे , दिमाग से . आँखें तो अपलक राजन को ही निहारती रही थीं …..दुआएं मांगती रहीं थीं …..और विचार शून्य दिमाग राजन को ही निरखता-परखता रहा था. “मेरे हिस्से का भी ….राजन को ही दे-दे ना – परमात्मा !” सावित्री की ये आखिरी अरदास थी.
क्या-क्या नहीं दिया , सावित्री ने …राजन को ….?
“देख , बे ….! बांगड़ू ….” अचानक सावित्री ने सुलेमान सेठ की आवाज़ सुनी थी. “इधर-उधर छोकरिओं को मत देखते रह जाना ….!” उस ने राजन का ध्यान सावित्री से हटाया था. “चंद ….मिन्टों में खेल ख़त्म होता है !” उस ने चेतावनी दी थी. “एक-एक …सैकिंड …एक-एक कदम का हिसाब-किताब जौकी को रखना होता है ….और अगर ….चूका तो ……!”
“जहन्नुम में भी जगह नहीं मिलती, मित्र !” छीतर कह रहा था. “धुल गए ….तो …गए …!” उस ने सावित्री की ओर इशारा किया था.
राजन ने महसूस किया था कि …अगर वो हारा तो ….छीतर उस में बे-भाव जूते मारेगा …!
सावित्री तक पहुँचने के लिए ….राजन का जीतना ज़रूरी था – वह जान गया था.
“जान लड़ा दूंगा …..आज …..!” मन ही मन निश्चय किया था , राजन ने .
वह दृश्य जब राजन – कजरी पर सवार ….जौकी बना ….दौड़ में शामिल होने को तैयार था – सावित्री के सामने बार-बार उभर कर आ खड़ा होता है. कोई महाराणा प्रताप ही था – वह , सावित्री के लिए जो जंग जीतने जा रहा था. एक ऐसी जंग ….जिस के ज़रिए उस के पिता – सेठ धन्नामल को …नया जीवन मिलना था ….नया नाम …और नया काम स्थापित होना था ….धन की प्राप्ति होनी थी …..जिस के बिना उन की नैया बुरी तरह डगमगा गई थी.
राजन एक आखिरी उम्मीद की तरह दोनों माँ-बेटियों के सामने तना खडा था !
दीपावली के अवसर पर आम तौर पर ही लोगों की भीड़ बढ जाती थी. जुआ खेलने वाले भी घुड-दौड़ में आनंद लेने चले आते थे. दुनिया भर के करोड़ पति और ….धनाड्य लोग इस अवसर का आनंद उठाने कलकत्ता पहुंचते थे. जम कर पैसा लगता था ….खूब बढ-चढ़ कर दाम लगते थे ….और इस मौके पर दौड़ जीतने के लिए ….हर कोई जान की बाज़ी लगा देता था. एक बार नाम कमाने के बाद ….रास्ता आसान हो जाता था.
सतरंगी भीड़ के साथ-साथ ….घोड़ों और सवारों की ….बहु-रंगी भीड़ भी कम दिलचस्प नहीं थी. उस भीड़ का एक हिस्सा बना राजन और उस की घोड़ी – कजरी भी ….अचानक एक अहमियत पा गए थे. रेस जीतने के बाद ….जो प्राप्त होना था ….वो अमूल्य था ….., यह अब तक राजन की समझ में समा गया था. वह तनिक खबरदार हुआ लगा था.
हालाँकि अभी तक वह इस भीड़ का हिस्सा था लेकिन जो लोग पहले से चर्चा में थे – उन्हीं का गुंड -गान होने लगा था.
“रोशन – ग्लोबल वालों का घोडा ….सम्पूरण को ले उड़ेगा …..! देख लेना …., इस बार भी …बाज़ी जीतेगा …!” आम चर्चा थी. “सम्पूरण ….खेला-खाया जौकी है. टिटकारी मारते ही ….रोशन उड़ने लगता है !” लोग पुराने अनुभव बाँट रहे थे. “पिछली बार तो …..”
“अब की बार क्या होगा ….., प्यारे ?” किसी ने व्यंग किया था. “लीड करेगा …., रोशन …करिश्मा के आगे ….” वह व्यक्ति कह रहा था. “पिछली बार तो ….तुक्का लगा था !”
करिश्मा चर्चा का विषय बनी हुई थी. स्याह-काली …नागिन जैसी करिश्मा ..अब की बार बाज़ी मारने के लिए तैयार थी. जौकी – नक्षत्र भी लोगों की नज़रों में चढ़ गया था. कुशल…चतुर ….चालाक , हंसमुख और हवाबाज़ – नक्षत्र से लोगों को आशा थी कि …अब की बार ….वह फतह हासिल ज़रूर करेगा !
करिश्मा पर जम कर दाव् लग रहे थे. नक्षत्र के फोटो भीड़ में भागे फिर रहे थे. सब नए-पुराने लोग इस नाम के साथ सहमत होते लग रहे थे.
नकुल और सहदेव तीसरे और चौथे नंबर पर थे. उन के जौकी सुबर्ण …और सरोबर के फोटो भी लोगों के सामने आ-जा रहे थे. उन से भी उम्मीदें थीं . उन का पिछला रिकॉर्ड बहुत ही विश्वसनीय था. सरोबर ….जौकी के किरदार में खूब जमता था. पिछली बार किस्मत खराब थी …वर्ना तो ….उस ने मोर्चा मार ही लिया था.
राजन और रानी – नए नाम का …..पुराना प्रचार जैसा हवा में तैर रहा था. लोग – सेठ धन्नामल को जानते थे. लोग जानते थे कि …सेठ धन्नामल का जहाज़ डूबने वाला था. कर्नल जेम्स के सर उन्हें डुबोने का सेहरा बांधना था .
“मुर्गा चला ….मोर की ढाल ….!” आम कहानी इजाद हो चुकी थी. सेठ धन्नामल भी यह सब जानते थे.
और …शायद तभी सेठ धन्नामल ….वहां कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे थे. हाँ, माँ-बेटियां चहकती-फुदकती ज़रूर दिखाई दे रही थीं. लोग उन्हें संदिग्ध निगाहों से देख रहे थे.
गले में दूरबीन लटकाए कर्नल जेम्स इत्मीनान से आईस -क्रीम खा रहे थे !!
जम कर पैसा लगा था. धन की गंगा बह रही थी. बाहर से आया फिरंगी लोगों का गिरोह खूब धन बहा रहा था. नामी-ग्रामी फ़िल्म अभिनेत्रियों के दर्शन करने आई भीड़ ….ततैया-बर्रैयाओं की तरह ….इधर-उधर घूम रही थी. सब के जैसे डंक लगे थे…..और तनिक सी टक्कर होने पर ….विवाद खड़ा हो जाता था !
अचानक घोषणा हुई थी. दौड़ आरंभ होने को थी. गेट खुलने वाले थे. निश्चित किया वक्त आ पहुंचा था. गिनती आरंभ हो चुकी थी….सब लोग भी साथ-साथ गिनते जा रहे थे… उलटी गिनती !!
राजन नर्वस नहीं था. कजरी ने भी सब सूंघ-समझ लिया था. क्या होना था – वह दोनों जान गए थे. गेट खुलने के सदमे से वो दोनों असंप्रक्त थे.
गेट खुलते ही घोड़े दौड़ पड़े थे. एक चक्रवात जैसा रेस -कोर्स के ऊपर …तैरता-तैरता …आगे बढ़ने लगा था…! राजन ने कजरी को थपकी दी थी …और …कान में कहा था , “इ-जी …! टेक …इट …इ-जी …!” और वह दोनों भीड़ का हिस्सा बने दौड़ रहे थे.
सब से आगे सरोबर और ….सहदेव थे. लोग तालियाँ बजाने लगे थे. लोगों को जाँच गया था …कि इस बार सरोबर बाज़ी नहीं हारेगा ! लेकिन …..तभी काली नागिन सी करिश्मा उस का रास्ता काट कर ….आगे हो गई…! एक हड़बोंग-सा भीड़ में भर गया …! करिश्मा के चहेते चिल्ला रहे थे – वेल डन, करिश्मा….! वक-अप ….!!
“नक्षत्र …कम -आन …!” रोशन और सम्पूरण के भक्त अप्रसन्न थे . सम्पूरण को लोग गालियाँ निकाल रहे थे. “निकम्मा है , ये ! घोडा जौम लगा रहा है ….पर …ये जौकी ……?”
और फिर एक अजीव आश्चर्य लोगों को देखने के लिए मिला था ! कईयों को तो लगा था …कि उन की दूर बीन कहीं और घूम गई थी ! कईयों ने दृश्य को नंगी आँखों से निरखा था. कईयों ने …अब आगे दौड़ते घोड़े का नाम पूछा था. तभी हवा में गूंजा था , “राजन ….और ….रानी ….! सबसे आगे ….और आगे …आगे दौड़ते हुए ….लीड कायम कर चुके हैं ….! शायद …..निश्चित …है …कि …”
उछल रही थी – सावित्री ! विफर-विफर कर गीता – राजन को पुकार रही थी !! दोनों माँ-बेटियों को …आस-पास की जमा भीड़ आश्चर्य से देख रही थी…!
“धन्नामल की बेटी है ….! वो …उस की माँ है ….!!” लोग पहचानने लगे थे. “सेठ धन्नामल …का है …., “राजन-रानी का जोड़ा …”
“हंसों का जोड़ा है ,…..बे ! जीतेगा ……..!!”
“शायद …..!”
“जीतेगा …..!!” कर्नल जेम्स ने मुस्कराकर कहा था. “अवश्य …जीतेगा ….! अब ..नहीं ..रुकेगा ….!!” वह प्रसन्नता से बे-काबू हुए लगे थे. बड़े दिनों के बाद ….कर्नल जेम्स को किसी ….ख़ुशी और आल्हाद ने छुआ था …! वो राजन के आभारी थे.
फटी-फटी आँखों से जमा भीड़ जीतने वाले – राजन और रानी को …देखते ही रह गए थे. “ये …कौनसी …गाज गिरी थी ….?’ लोग अनुमान ही न लगा पा रहे थे. समूंचा श्रेय कर्नल जेम्स को गया था !
सावित्री सोच रही थी – उस का बांका वीर – राजन अभी-अभी हल्दी-घाटी का युद्ध जीत कर लौटा था ! और अब उसे अपनी जीत का इनाम दरकार था ….!! आग्रही निगाहों से सावित्री को घूरता – राजन ….ये भूल ही गया था कि …जमा भीड़ के ठट के ठट …उसे आश्चर्य जनक निगाहों से देख रहे थे…! सराह रहे थे …!! उस ने सावित्री के पास जा कर …बे-हिचक उसे छू लिया था …! फिर उस ने सावित्री को अपनी बलिष्ठ बांहों में भर कर ….अधर उठा लिया था ….और फिर उसे अपने सीने से लगा लिया था ….!! आहिस्ता से फिर उस ने सावित्री के कान में कहा था , “आई …लव …यूं ….., सूजी …!!”
“आई ….लव ….यूं , …राजू …!!” सावित्री भी बे-हिचक बोली थी.
मोह-भंग हुआ तो ….दोनों ने एक साथ माँ को देखा था…! वो उन दोनों को ही अपलक देखे जा रही थीं …! राजन को तनिक-सा ज्ञान हुआ तो …उस ने ….गीता के चरण-स्पर्श किए थे ….! पर गीता मौन थी …और मौन ही बनी रही थी ….!! सावित्री ने माँ से आँखें चुरा लीं थीं ….!
“व्हाट ….ए ….विक्ट्री , ….राजन ….!!” कर्नल जेम्स अब राजन को बांहों में भरे खड़े थे. “आई …..एम् ….प्राउड …ऑफ़ यू , माय …बॉय …!!” उन्होंने राजन की पीठ थपथाई थी.
छीतर और सुलेमान सेठ ….दोनों दंग हुए …..राजन को देखते रहे थे ….सिहाते रहे थे ….!!
