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पश्चाताप

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“तुम! तुम्हे…. तुम्हे यहाँ का पता किसने दिया?” आज महीनों बाद अपनी दहलीज पर कासिम को देखते ही एक बार फिर से अपना किया हुआ गुनाह उसकी आँखों के सामने आ गया।

चोरी किये पैसे को अकेले ही संभालने के चक्कर में वो दोस्त पर जानलेवा हमला कर घटनास्थल से भाग निकला था लेकिन तब से उसे अपने किये पर दुःख के साथ साथ उसकी वापिसी का एक अनजाना डर भी सताता रहता था।

“दोस्त जिसे ढूंढना चाहो उसे ढूंढ ही लिया जाता है।” कासिम के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान आ गयी।

“कासिम देखो…, देखो मेरी बात सुनो, मैं तुम्हे मारना नहीं चाहता था लेकिन पता नहीं मुझे क्या हो गया था।” अपनी की हुयी गल्ती ने उसकी आवाज को घबराहट में बदल दिया।

“डर गए दोस्त! अरे, जिस पैसे के लिये तुमने अपना ईमान खोया, वो तो यहाँ नजर आ नहीं रहा।” कासिम ने फटेहाल घर पर अपनी गहरी नजरें टिका दी।

“पाप का पैसा कभी सुख नहीं देता कासिम, चोरी के पैसे के लिए तुम्हें धोखा देकर मैंने तुम्हे मारना चाहा। सचमुच बहुत बुरा हूँ मैं।” कहते-कहते उसकी आँखें झुक गयी।

“हां! तूने मुझे मारने की कोशिश की थी लेकिन….” कासिम ने आगे बढ़कर उसके हाथ थाम लिए। “लेकिन दोस्त, मुझे बचाने के लिये एक बार खून भी तो तूने ही दिया था।”

“फिर भी मैंने बहुत ग़लत किया दोस्त।” वो अभी भी सर झुकाये खड़ा था।

“नहीं दोस्त! तूने तो वहीं किया था जो कभी मैंने तुझे सिखाया था…।” अनायास ही कासिम की आँखें नम हो गयी”…..आखिर हथियार भी तो मैंने ही तुझे थमाया था।” अपनी बात पूरी करने के साथ ही कासिम ने उसे गले से लगा लिया था।

विरेंदर ‘वीर’ मेहता  

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